चुनाव आयोग से लेकर तमाम सरकारी एजेंसियां चिल्ला-चिल्ला कर कहती हैं कि आपका वोट बहुमूल्य है और इसका सही ढंग से इस्तेमाल करें। लेकिन लगता है कि भारतीय वोटरों ने इसका मूल्य रुपयों के संदर्भ में आंकना अभी भी नहीं छोड़ा है। यही कारण है कि जागरूकता अभियान के बावजूद वोट के बदले नोट लेने वालों की संख्या में गिरावट आने की बजाय लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उससे भी ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि इस काम में अक्सर ज्यादा समझदार व पढ़े-लिखे माने जाने वाले शहरी वर्ग के लोग ज्यादा सक्रिय हैं।
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस), इंडिया ने इस संबंध में एक स्टडी जारी की है, जिसके मुताबिक देश के 70 फीसदी वोटर किसी न किसी प्रभाव में आकर अंतिम क्षणों में अपना फैसला बदल लेते हैं। हालांकि सबसे कारण तो पैसा ही है, जिसके लालच में आकर वोटर अपने मत का इस्तेमाल सही ढंग से नहीं करते हैं। इसके अलावा भी कई तरह के दबाव हैं, जो चुनावों में वोटरों को फंसाने के लिए काम में लाए जा रहे हैं। मसलन, स्थानीय लोगों का दबाव, प्रभावी चुनाव प्रचार, टीवी चैनलों व अखबारों की खबरें, चुनावी घोषणा पत्र के लुभावने वादे। और सबसे ज्यादा पैसों का लालच, यह दांव तो बरसों से हर चुनाव में कारगर साबित हो रहा है। भोलाभाला वोटर किसी न किसी जाल में फंसकर अपने दिमाग का इस्तेमाल किए बिना ही अपना वोट डाल देता है।
2007 से 2014 के दौरान की गई स्टडी के मुताबिक 2008 की तुलना में 2014 में ऐसे वोटरों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है, जो मतदान के लिए पैसों को एक अहम कारण समझते हैं। सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी का दावा है कि उन्होंने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान इस संबंध में गहन शोध किया है। जिन राज्यों में यह रिसर्च की गई, उनमें दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य शामिल हैं। कर्नाटक में जहां 2008 में सिर्फ सात फीसदी ही मानते थे कि वोट के बदले नोट लेने चाहिए, लेकिन 2014 में यह नंबर बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया। महाराष्ट्र में यह प्रतिशत 2 फीसदी से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया।