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जेल के नाम पर पत्नी संग कहीं और मौज काट रहे हैं अमरमणि

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मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के सजायाफ्ता अमरमणि और उनकी पत्नी मधुमणि फिट करार दिए जाने के बावजूद मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड में बदस्तूर बने हुए हैं। डिस्चार्ज करने के नाम पर पिछले तीन हफ्ते से एसआईसी, प्राचार्य और इलाज करने वाले डॉक्टर के बीच चल टालमटोल किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रही।
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दरअसल मामला हाई प्रोफाइल है, इसलिए कोई भी फैसला लेने से बचता फिर रहा है। भर्ती करने वाले साइकियाट्री विभाग के डॉ. सीपी मल्ल ने दोनों को ओपीडी में इलाज के लायक तो बता दिया लेकिन डिस्चार्ज स्लिप नहीं बनाई।

पूछने पर बताते हैं कि डिस्चार्ज करने का फैसला लेने का अधिकारी बोर्ड को है। जबकि एसआईसी डॉ. रामयश यादव का कहना है कि डिस्चार्ज करने का निर्णय भर्ती करने वाले डॉक्टर को ही करना होगा।
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जेल के नाम पर दो साल से काट रहे अस्पताल में मौज

डॉ. यादव तो तल्ख लहजे में यहां तक कहते हैं कि जब भर्ती किया था, तब तो बोर्ड से नहीं पूछा था। डॉ. यादव कहते हैं कि मैंने डिस्चार्ज न करने के सवाल पर डॉ. मल्ल को कड़ा पत्र भी लिखा है लेकिन वह उसका जवाब नहीं दे रहे।

उन्हें बहुत जल्द रिमाइंडर दिया जाएगा। उधर एसआईसी को ओर से प्राचार्य प्रो. केपी कुशवाहा को इस संबंध में दिशा-निर्देश के बाबत भेजा गया पत्र भी आफिस की फाइलों में दब गया है।

कॉलेज के हर मामले पर अपनी पैनी नजर रखने वाले प्राचार्य भी इस संबंध में किए गए सवालों पर कतराते नजर आते हैं। कहते हैं कि यह निर्णय तो एसआईसी को ही लेना होगा।
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बोर्ड अस्तित्व में नहीं पर बहाना उसी का

हाई प्रोफाइल कैदी मरीजों के भर्ती-डिस्चार्ज पर जब डॉक्टर अकेले जिम्मेदारी लेने से कतराने लगे तो सबने बोर्ड बनाने का फैसला लिया। इसे लेकर इतनी जल्दी की गई कि प्राचार्य प्रो. कुशवाहा के शहर से बाहर रहने के बावजूद कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. सतीश कुमार के नेतृत्व में 39 सदस्यीय बोर्ड का गठन कर लिया गया।

जिसमें सभी क्लीनिकल विभागों के हेड और एक वरिष्ठ चिकित्सक शामिल किए गए। लगा कि जल्द ही सभी रसूखदार कैदियों की जेल वापसी हो जाएगी। बोर्ड ने पहली ही बैठक में इस बाबत फैसला भी ले लिया और सभी को डिस्चार्ज करने लायक बता दिया लेकिन बोर्ड की फाइल प्राचार्य के कमरे में दबकर रह गई।

प्राचार्य ने फाइल को यह कहकर दरकिनार कर दिया कि उसमें सभी सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं हैं। अब तो बोर्ड का नाम लेने पर डॉक्टर मुस्कुरा कर रह जाते हैं। जबकि डॉ. सीपी मल्ल कहते हैं कि अमरमणि और मधुमणि का मामला बोर्ड की जिम्मेदारी है।
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