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मोदी सरकार की सरपरस्ती में रिहा हुआ मसर्रत

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कट्टर अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई का फैसला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने नहीं लिया था। बल्कि मुफ्ती की सरकार बनने से पहले ही राज्यपाल शासन में मसर्रत की रिहाई के फैसले मोहर लगा दी गई थी।
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मसर्रत की रिहाई के संबंध में जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव सुरेश कुमार और जम्मू के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बीच फरवरी में पत्राचार हुआ था। उस पत्राचार में ही मसर्रत को हिरासत में रखे जाने के आदेश को निरस्त करने की जानकारी दी गई थी। हिरासत के आदेश निरस्त करने की फैसला गृह और कानून एवं न्याय मंत्रालय की सहमति से लिया गया।

उल्लेखनीय है कि राज्यपाल शासन अथवा राष्ट्रपति शासन में संबंधित राज्य की सत्ता परोक्ष रूप से केंद्र सरकार के ही नियंत्रण में होती है। इसलिए मसर्रत की रिहाई का फैसला केंद्र सरकार का ही फैसला माना जा सकता है।
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कांग्रेस ने मोदी सरकार पर किया हमला

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में कहा था कि मसर्रत की रिहाई के मामले में केंद्र सराकार को अंधेरे में रखा गया। जम्मू-कश्मीर की मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार को कड़ा संदेश देते हुए मोदी ने कहा था कि ऐसी हरकत को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। देश की एकता और अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

हालांकि मंगलवार को मसर्रत की रिहाई के फैसले में राज्यपाल शासन की भूमिका सामने आने के बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तगड़ा हमला बोल दिया।

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्विटर पर कहा कि मसर्रत आलम की रिहाई के लिए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मोहम्मद सईद को क्यों दोषी ठहाराया जा रहा है, जबकि ये फैसला राज्यपाल शासन में लिया गया था और राज्यपाल स‌ीधे मोदी सरकार के नियंत्रण में था।

गृह सचिव ने डीएम को लिखी थी चिट्ठी

मसर्रत आलम की रिहाई को लेकर दो पत्र सामने आए हैं। पहला पत्र जम्‍मू-कश्मीर के गृह सचिव सुरेश कुमार और जम्‍मू के ‌डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट को चार फरवरी को लिखा था।

उस पत्र में गृह सचिव ने डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट ने कहा है कि अलगाववादी (मसर्रत आलम) को जन सुरक्षा कानून के तहत सितंबर में हिरासत में रखने को जो आदेश दिया गया था, वह निरस्त हो चुका है, क्योंकि गृहमंत्रालय (राज्य) ने उस पर सहमति नहीं जताई है।

पत्र में कहा गया है कि आदेश पर सहमति देने के लिए आवश्यक 12 दिनों की समय सीमा पहले ही खत्म हो चुकी है। इसलिए कानून की नजर में हिरासत में रखने का आदेश गैर जरूरी हो गया।

गृह सचिव ने पत्र में ये जरूर कहा कि अलगाववादी को नए अधार पर हिरासत में लिया जा सकता है। हालांक‌ि डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट नए आधार पर हिरासत में रखने के बजाय एसपी को लिखे पत्र में मसर्रत को रिहा करने के आदेश दिया हैं।
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15 और अलगाववादियों के रिहाई संभव

गृह सचिव और डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्ट्रेट के बीच पत्राचार फरवरी में हुआ है, जबकि मुफ्ती मोहम्‍मद सरकार एक मार्च को सत्ता में आई थी।

हालांकि पूरे मामले में आश्चर्यजनक पहलू यह है कि मसर्रत के मामले में बीजेपी मुफ्ती पर हमलावर रही है, जबकि फैसला उसी की सरकार के शासन के दरम्यान लिया गया। और मुफ्ती मोहम्मद सईद, ये जानते हुए कि मसर्रत की रिहाई की फैसला उनकी सरकार का नहीं है, चुप्पी साधे रहे और कश्मीरी अलगाववादी नेताओं की वाहवाही लूटते रहे।

एक रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीर में कुल 145 राजनीतिक कैदी हैं, जिनमें 15 की रिहाई संभावित है। काबिले गौर ये है कि मसर्रत आलम पर हो रहे हंगामे के बाद भी मुफ्ती सरकार उनकी रिहाई के फैसले पर आगे बढ़ती है या नहीं।
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