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ये कैसी चर्चा: आरोप के जवाब में आरोप

Thu, 13 Aug 2015 05:57 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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लोकसभा में बुधवार को 'ललितगेट' पर जो चर्चा हुई अगर वही चर्चा होनी थी तो यह मानसून सत्र को बर्बाद किए बिना भी हो सकती थी।
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क्या निकला इस चर्चा से? शायद कुछ नहीं। क्योंकि यह तो चर्चा थी ही नहीं। आरोप थे, सवाल थे और उसके जवाब में फिर आरोप थे और सवाल। लगातार विषयांतर था और यह सवाल छूट गया कि आखिर जो सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे ने जो किया वह सही था या गलत? यह सवाल और बड़ा हो गया कि आखिर इस मसले पर हमेशा मुखर रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले में क्यों चुप हैं और वे क्यों इस चर्चा का जवाब देने के लिए सदन में नहीं आए?

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ। अगर बहुत पुराने मसलों पर न भी जाएं तो यूपीए सरकार पर जब विपक्ष राष्ट्रमंडल खेल, 2जी और कोयला घोटाले को लेकर आरोप लगा रहा था तो भी ऐसा ही हो रहा था। यूपीए की ओर से आरोपों के जवाब में कभी बंगारू लक्ष्मण को याद किया गया तो कभी कॉफिन घोटाले को। 2जी घोटाले पर तो यह तक कहा गया कि संचार मंत्रालय ने एनडीए के पुराने शासनकाल के दौरान जो नियम बनाए वह इसके लिए दोषी थे। पुराने संचार मंत्री, प्रमोद महाजन, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, का नाम भी इसमें घसीट लिया गया।
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यही बुधवार को सुषमा स्वराज ने भी किया। कांग्रेस की ओर से उन पर गंभीर आरोप लगाए गए। कई सवाल पूछे गए। लेकिन अनुभवी राजनीतिज्ञ और कुशल वक्ता सुषमा स्वराज से जवाब उन सवालों के नहीं मिले। जवाब में आया प्रत्यारोप। भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य अभियुक्त एंडरसन को लेकर और बोफोर्स मामले में दलाली के आरोपी रहे क्वात्रोची को लेकर।

राहुल गांधी ने सवाल पूछा कि सुषमा स्वराज के वकील पति और बेटी को ललित मोदी का वकील होने के नाते कितने पैसे मिले, तो जवाब में सुषमा स्वराज ने कहा, "अपनी मां से पूछना कि क्वात्रोची से कितने पैसे मिले।"

भाजपा के एक सांसद ने तो सोनिया गांधी की बहन का नाम भी लिया।

इस देश के हर मतदाता और नागरिक को इस चर्चा के बाद पूछना चाहिए कि राजनीति में लगाए जा रहे इन आरोपों के जवाब मिलेंगे भी या नहीं? या फिर आरोपों के जवाब में प्रत्यारोप ही सुनने को मिलता रहेगा?
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सुनने में आता है कि हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है लेकिन इसमें संसद सदस्यों और सरकार के कर्ताधर्ताओं की जवाबदेही तय होने की प्रक्रिया कहीं भी बनती नहीं दिख रही है। आखिर कब तक हम इस बात पर ख़ुश होते रहेंगे कि मतदाता ताकतवर है और पांच साल पर सरकार बदलने का माद्दा रखता है, चाहे वो कितनी भी मजबूत सरकार क्यों न हो?
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