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दया याचिका में देरी पर मृत्युदंड उम्रकैद में तब्दील

Wed, 01 May 2013 10:25 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका के निपटारे में 11 साल की देरी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महेंद्र नाथ दास की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।
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असम निवासी दास ने जमानत पर छूटने के बाद अपने दुश्मन का सिर काट दिया था। सिर को हाथ में लेकर उसने आत्मसमर्पण कर दिया था।

जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने देरी को अनुचित बताते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की मुजरिम की विशेष अनुमति याचिका को स्वीकार कर लिया।

याद रहे कि दिल्ली बम विस्फोट के मुजरिम देविंदर पाल सिंह भुल्लर की इस तरह की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों खारिज कर दिया था।

हत्या के मामले में जमानत पाने के बाद महेंद्र नाथ दास ने 24 अप्रैल, 1996 को हरकांत दास का सिर धड़ से अलग कर दिया था। वह सिर अपने हाथ में लेकर पुलिस के पास पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया।
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सत्र अदालत ने उसे 1997 में फांसी की सजा दी। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 1998 और सुप्रीम कोर्ट ने 14 मई, 1999 को उसकी मौत की सजा को कायम रखा।

सुप्रीम कोर्ट से मृत्युदंड की पुष्टि होने पर दास ने असम के राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की।

राज्यपाल ने सात अप्रैल, 2000 को दया याचिका खारिज कर दी लेकिन राष्ट्रपति ने दया याचिका का निपटारा करने में 11 साल का समय लगा दिया।

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने आठ मई, 2011 को दया याचिका खारिज कर दी। राष्ट्रपति की अनावश्यक देरी पर दास ने एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया।

उसने गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 30 जनवरी, 2012 को मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट के आदेश को दास ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दास को अंतत: सफलता मिली।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट से लेकर देश की शीर्षस्थ अदालत ने जघन्य हत्याकांड का केस तीन साल में निपटा दिया लेकिन राष्ट्रपति ने दया याचिका का निपटारा करने में 11 साल की देरी की।

यह देरी वाजिब नहीं है। दास पिछले लगभग 15 साल से जोरहाट जेल में बंद है। हत्या के जिस मामले में दास को जमानत मिली थी, उसमें भी अदालत ने उसे दोषी ठहराया था।
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