चेल्लामुथु फिलहाल एक नाम भर है। ये उसी तमिलनाडु का एक दलित था, जिसकी सरकार जल्लीकट्टू के लिए केंद्र सरकार से अध्यादेश लाने की मांग कर रही है। पिछले महीने चेल्लामुथु की मृत्यु हो गई, हालांकि वह जिस गांव का निवासी था, वहां श्मशान तक जाने के लिए आम रास्ता अलग था और दलितों का रास्ता अलग। दलितों का रास्ता बहुत ही खराब हालत में था, इसलिए उसके घर वालों ने आम रास्ते उसका शव श्मशान तक ले जाने का फैसला किया।
आम रास्ते पर दलितों का चलना मना था। दलितों के खिलाफ तमिलनाडु में प्रचलित ये एक ऐसा कानून है, जो किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं है। हालांकि धर्म और पंरपरा की दुहाई पर ये अब तक कायम है। चेल्लामुथु के परिजनों को भी ये एहसास था कि उन्हें आम रास्ते से होकर नहीं जाने दिया जाएगा।
ये सोचकर ही उसके पोते कार्तिक ने तमिलनाडु उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा दिया। कोर्ट ने उन्हें आम रास्ते से शव ले जाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो दलितों को आम रास्ते का इस्तेमाल करने से रोकता है। ये वाकया तमिलनाडु के नागपट्टनम जिले के कुट्टालम तालुक के थिरुनालकोंडाचेरी गांव का है।
कोर्ट ने प्रशासन और पुलिस को भी दिया आदेश
कोर्ट ने नागपट्टनम जिले की प्रशासन और पुलिस को आदेश दिया कि वो ये सुनिश्चित करे कि आम रास्ते से सभी लोग आ जा सके। उसके बाद अधिकारियों ने दलित और सवर्ण जाति के प्रतिनिधियों को बुलाया और बातचीत की। हालांकि सवर्ण जाति के हिंदुओं ने उच्च न्यायालय के आदेश को मानने से इनकार कर दिया।
उन्होंने दोहराया कि वे दलितों को आम रास्ते से शव ले जाने की इजाजत नहीं देंगे। प्रशासन ने भी सवर्ण हिंदुओं की अड़ियल रुख के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने के बजाय उनका तुष्टिकरण किया। उन्होंने एक नया रास्ता बनवाया और उससे दलितों को शव ले जाने को कहा।
दलितों ने प्रशासन के फरमान का विरोध किया और नए रास्ते से शव ले जाने से मना किया। हालांकि पुलिस ने उनकी बातों पर बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया। दलितों ने अपनी मांग मनवाने के लिए आत्मदाह का भी प्रयास किया। पुलिस ने विरोध प्रदर्शन कर रहे दलितों को गिरफ्तार कर लिया।
सवर्ण हिंदुओं ने नहीं माना कोर्ट का आदेश
प्रशासन दलितों की गिरफ्तारी तक ही नहीं रुका, उसने पुलिस का इस्तेमाल कर चेल्लामुथु का शव उठवाया और नए बने रास्ते से ले जाकर दफना दिया।
सर्वण हिंदुओं ने आदेश न मानकर उच्च न्यायलय की अवहेलना की, लेकिन सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की। थिरुनालकोंडाचेरी गांव का ये मामला तमिलनाडु का इकलौता मामला नहीं है।
पिछले साल जुलाई में अनुसूचित जाति के राष्ट्रीय आयोग दलितों पर अत्याचार की सूची जारी की थी, जिसमें तमिलनाडु पांचवें स्थान पर था। आंकड़ों के अनुसार, 2011 से जुलाई, 2015 तक तमिलनाडु में 213 दलितों की हत्या हुई थी।