मेरठ में पुलिस की वर्दी बदमाशों को खूब भा रही है। वर्दी पहनकर वारदात करते हैं और आराम से फरार हो जाते हैं। ऐसा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि पुलिस की वर्दी आसानी से उपलब्ध जो हो जाती है। महज दो हजार रुपये खर्च करके कोई भी बदमाश ‘बावर्दी दरोगा’ बन जाता है। वर्दी की बिक्री को लेकर न कोई सख्ती है और न नियम कायदा। इसका पूरा फायदा बदमाशों को मिल रहा है।
रविवार को सहारनपुर में ज्वेलरी शोरूम में हुई डकैती को भी वर्दीधारी बदमाशों ने अंजाम दिया। इससे पूर्व मेरठ में भी कई बार वर्दी वाले बदमाश कहर बरपा चुके हैं। 24 जनवरी की रात भावनपुर थाना क्षेत्र के कुली शाहपुर में बदमाशों ने बिजलीघर पर धावा बोला और करीब 40 लाख रुपये का माल लूटकर ले गए थे। वारदात करने आए बदमाश वर्दी में थे और अपने वाहन पर हूटर भी लगाकर आए थे। इसी माह खरखौदा क्षेत्र में भी बिजलीघर पर लूटपाट मचाई गई, तो उसमें भी कुछ बदमाश पुलिस की वर्दी में आना बताए गए थे।
तीन नवंबर 2014 को दो लाख के इनामी बदमाश राहुल खट्टा ने गाजियाबाद के धौलाना क्षेत्र से ईंट भट्ठा व्यवसायी नवीन कंसल का अपहरण कर लिया। अपहरण के दौरान राहुल खट्टा दरोगा की वर्दी पहनकर कार में बैठा था। एक महीना पूर्व मोदीपुरम में बैंक कैश वैन लूटने वाले बदमाशों में भी एक वर्दीधारी बताया गया था। वहीं, एनएच 58 पर मेरठ से गाजियाबाद जा रहे सर्राफ से दिसंबर माह में वर्दीधारी बदमाशों ने ही सोना लूटा था।
ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र में डेढ़ साल पूर्व बुलंदशहर के गांव भटौना का निवासी अरुण चौधरी पुलिस की वर्दी में दुकानदारों से वसूली करते पकड़ा गया। अहम सवाल ये है कि जब बार बार पुलिस की वर्दी पहनकर बदमाश वारदातें कर रहे हैं, तो वर्दी की बिक्री को लेकर नियम कानून क्यों नहीं बन रहा? कम से कम सिपाही, दरोगा की कैप, स्टार, बेल्ट की खुलेआम बिक्री बंद की जा सकती है।