वही ब्रज है जहां कान्हा की बंशी की धुन पर गोपिकाएं और गाय मुग्ध हुआ करती थीं, आज हजारों साल बाद भी श्री राधे राधे... और राधे-कृष्ण-राधे-कृष्ण जैसे भजन-संगीत की धुनों की गाय दीवानी हैं। संगीत की धुन पर दूध दुहने का प्रयोग यहां के वेटरिनरी विश्वविद्यालय के डेयरी फार्म पर किया जा रहा है। प्रयोग के दौरान देखा गया कि बृज के मधुर संगीत की धुन सुनकर गाय बड़ी आसानी से ग्वालों को दूध दे रही है साथ ही उसकी मात्रा भी सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो अनुसंधान संस्थान के डेयरी फार्म के इंचार्ज डॉ. रजनीश सिरोही कहते हैं कि डेयरी फार्म में म्यूजिकल बाड़े का निर्माण किया गया है। बाड़े में ब्रज के संगीत के लिए सिस्टम लगाया गया है। आरती, भक्ति संगीत की मधुर धुन गायों के कानों में पड़ती है और वह दूध दे रही हैं।
डॉ. सिरोही ने बताया कि ऑक्सीटोसिन हार्मोंस सक्रिय होने पर गाय दूध देती है। मस्तिष्क से तरंग के माध्यम से मैसेज जाने पर ऑक्सीटोसिन हार्मोंस सक्रिय होता है। यह पांच से सात मिनट तक ही सक्रिय रहता है। गाय का बच्चा जब दूध पीता है तो गाय के शरीर में ऑक्सीटोसिन हार्मोंस सक्रिय हो जाते हैं। हार्मोंस के निष्क्रिय होते ही दूध आना भी बंद हो जाता है।
संगीत भी गायों के मस्तिष्क पर ऑक्सीटोसिन हार्मोंस को सक्रिय करने में असर करता है। भक्ति संगीत को सुनकर गाय को अहसास होता है कि उनकी बछिया या बछड़ा उनका दूध पी रहा है। वह आसानी से अधिक मात्रा में दूध देती है। डा. सिरोही का कहना है कि संगीत से गायों में दूध देने की क्षमता में वृद्धि भी हो रही है।अब तो विदेशों में भी गायों को संगीत सुनाकर अधिक दूध लेने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है।
ऑक्सीटोसिन का विकल्प संगीत
विदेशी गायों के मुकाबले देसी गायों में मातृत्व की भावना अधिक होती है। यही कारण है कि बच्चा मरने के बाद वह दूध नहीं देती। विदेशी गाय ऐसी परिस्थिति में भी दूध दे देती हैं। बच्चा मरने की स्थिति में भी संगीत की तरंगें गाय के मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन हार्मोंस को सक्रिय करेंगी और गाय को दूध देने के लिए प्रेरित करेंगी। इस तरह बिना ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के भी बच्चा मरने पर गाय से दूध लिया जा सकता है।