आम चुनाव में भाजपा कहीं अपने पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की देशव्यापी लहर का दावा कर रही है तो कहीं इस लहर के सुनामी बन जाने का।
मगर जहां तक मोदी के घर और भाजपा के गढ़ की बात है तो यहां इस लहर की रफ्तार धीमी हो जाने का खतरा मंडरा रहा है।
गुजरात की आधा दर्जन सीटों पर जहां कांग्रेस बेहद मजबूत स्थिति में है, वहीं इससे अधिक सीटों पर भाजपा को कांटे का टक्कर दे रही है।
बाहरी उम्मीदवार बने भाजपा की मुसीबत!
भाजपा उम्मीदवारों, नेताओं और कार्यकर्ताओं में मोदी लहर का आत्मविश्वास कुछ ज्यादा ही है। लेकिन एक तिहाई बाहरी उम्मीदवार भाजपा के सभी कार्यकर्ताओं से अच्छा तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं।
पार्टी भले ही मोदी को पीएम बनाने के नारे और अभियान को गुजरात की अस्मिता से जोड़ कर राज्य में क्लीन स्वीप करने का दावा कर रही है। मगर हकीकत यह है कि अगर दर्जन भर सीटों पर कांग्रेस की मजबूत स्थिति मतदान के दिन तक बनी रही तो पार्टी वर्ष 1999 के 21 सीटें जीतने के रिकार्ड की बराबरी के लिए भी तरस सकती है।
राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि भाजपा इस राज्य में इस बार अधिकतम सीटें जीतने का कीर्तिमान बनाने से फिलहाल दूर है।
मोदी की गैरहाजिरी में थ्रीडी प्रचार का सहारा
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 26 में से 15 सीटों पर विजय हासिल की थी। बाद में दो सीटों पर हुए उपचुनाव में पार्टी ने कांग्रेस को पराजित कर अपनी सीटों की संख्या 17 कर ली थी।
दरअसल पीएम पद का उम्मीदवार होने के कारण मोदी इस बार अपने गृह प्रदेश को ज्यादा समय नहीं दे पाए हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने थ्रीडी प्रचार माध्यम का जमकर इस्तेमाल किया है।
बाहरी उम्मीदवार मुद्दा न बने, इसलिए वह बार-बार दोहरा रहे हैं कि राज्य की हर सीट पर वह खुद ही उम्मीदवार हैं। भाजपा भी अपने प्रचार में गुजरात के पास पीएम बनाने का सुनहरा मौका होने की बात प्रचारित कर रही है।
भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं ये मुद्दे
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम भाई सोनी कहते हैं कि अधिकतम सीटें जीतने का दावा फिलहाल सही प्रतीत नहीं होता। कई सीटों पर कांग्रेस भी बेहद मजबूत स्थिति में है।
अति आत्मविश्वास, मोदी की कम उपस्थिति, बाहरी और दलबदलू उम्मीदवार जैसे कई मुद्दे ऐसे हैं जो भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसके बावजूद अगर भाजपा ऐसा कर दिखाती है तो मानना होगा कि गुजरात के मतदाताओं के लिए बस मोदी का नाम ही काफी है। एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार वाहिद भाई सेठ का कहना है कि अगर कांटे वाली सीटों पर किस्मत ने कांग्रेस का साथ दिया भाजपा की परेशानी बढ़नी तय है।
इन सीटों पर है कांग्रेस का दबदबा
भरत सिंह सोलंकी आणंद सीट, तुषार चौधरी बारदोली, दिनशा पटेल खेड़ा, शंकर सिंह बाघेला साबरकांठा, भवसिंह राठोर पाटन और किशनभाई पटेल वलसाड सीट पर बेहद मजबूत स्थिति में हैं।
इसके अलावा दाहोद, पंचमहल, मेहसाणा, अमरेली, राजकोट, जामनगर, वलसाड में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी और कांटे की टक्कर है।
अहमदाबाद पूर्व और अहमदाबाद पश्चिम सीट पर भाजपा बाहरी उम्मीदवार के कारण परेशानी महसूस कर रही है।
और कायम है विहिप की दूरी
लोकसभा चुनाव में भले ही आरएसएस ने मोदी के लिए सारी ताकत झोंक दी हो, मगर विहिप ने हमेशा की तरह इस चुनाव में भी मोदी से दूरी बना रखी है।
सूत्रों का कहना है कि न तो मोदी विहिप नेताओं को मनाने गए और न ही विहिप नेताओं ने खुद आगे बढ़कर उनका साथ देना जरूरी समझा।
विहिप के राज्य इकाई के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक विहिप के कार्यकर्ता प्रचार से दूर हैं। हालांकि विहिप मोदी के खिलाफ भी प्रचार नहीं कर रही।