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मोदी सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी में कांग्रेस

Sun, 04 Jan 2015 08:01 AM IST
ब्यूरो, एजेंसी/अमर उजाला, नई दिल्ली
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भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के लिए लाए गए अध्यादेश का विरोध करने की तैयारी कर चुकी कांग्रेस ने सोमवार को अपने महासचिवों की बैठक बुलाई है। इसमें मोदी सरकार को किसान विरोधी के रूप में पेश करने के लिए देशव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की पहल पर यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया गया था। कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए कानून में संशोधन कर इसे काफी कमजोर बना दिया है। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने सोमवार को यह बैठक ऐसे वक्त में बुलाई है जब अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) ने साफ कर दिया है कि वह आने वाले दिनों में भूमि अधिग्रहण बिल संशोधन अध्यादेश, पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी और नीति आयोग के गठन जैसे मुद्दों पर आक्रामक रवैया अपनाएगी।

कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह निहित स्वार्थों के चलते अध्यादेश लेकर आई है। पार्टी ने याद दिलाया कि भूमि अधिग्रहण बिल को जिस संसदीय समिति ने अंतिम रूप दिया था उसकी अध्यक्षता भाजपा नेता और वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने की थी। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अध्यादेश पर सरकार से सफाई मांगना काफी गंभीर मामला है। पार्टी का कहना है कि वह हर फोरम पर अध्यादेश को चुनौती देगी और संसद के बाहर तथा अंदर इस मसले को उठाएगी।
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कांग्रेस को अब राज्यसभा में नेता विपक्ष का संकट

लोकसभा में विपक्षी दल का दर्जा खोने के सदमे से जूझ रही कांग्रेस को अब राज्यसभा में विपक्ष के नए नेता को चुनने में संकट का सामना करना पड़ रहा है। जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस की इस परेशानी की मुख्य वजह है। दरअसल, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की सदस्यता 10 फरवरी को खत्म हो रही है। आजाद के जम्मू-कश्मीर से दोबारा सदन में आने की धूमिल संभावनाओं के बीच कांग्रेस अब नए नेता की तलाश में जुट गई है। इस रेस में कांग्रेस हाईकमान के करीबी होने के नाते उपनेता आनंद शर्मा अपना दावा मजबूत करने में जुटे हैं तो वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह को भी प्रमुख दावेदारों में गिना जा रहा है।

विस चुनाव बाद उलझे गणित में जम्मू-कश्मीर में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा हुए बिना आजाद का वहां से चुनकर आना मुश्किल है। वहीं बजट सत्र से पहले आजाद के किसी और राज्य से आने की सूरत नहीं बन रही। जम्मू-कश्मीर में नई सरकार बनने में लग रहे वक्त की वजह से भी राज्यसभा चुनाव 10 फरवरी तक मुमकिन नहीं दिख रहा। इसलिए कांग्रेस को बजट सत्र के लिए विपक्ष के नए नेता की तलाश करनी पड़ रही है। आजाद की कुर्सी के कई दावेदार सामने आ रहे हैं।

अभी उच्च सदन में कांग्रेस के उप नेता आनंद शर्मा हैं। दस जनपथ से उनकी निकटता भी है और मोदी सरकार के खिलाफ बीते सत्र में उन्होंने अपनी आक्रामक रवैया भी दिखाया। मगर अपनी कुलीन राजनीतिक शैली की वजह से पार्टी के भीतर उनकी आम स्वीकार्यता नहीं होना उनका कमजोर पक्ष है। शर्मा को पार्टी नेता बनाती है तो फिर डेढ़ साल बाद ही राज्यसभा में उसे एक और नया नेता तलाशना पड़ सकता है क्योंकि राजस्थान से राज्यसभा में आए शर्मा का कार्यकाल जुलाई 2016 में खत्म हो रहा है। एक के बाद एक राज्यों में हार के बाद दिग्गज नेताओं को राज्यसभा में लाना कांग्रेस के लिए मुश्किल होता जा रहा है। पी. चिदंबरम जैसे नेता को भी राज्यसभा लाने की अभी तक गुंजाइश नहीं बनी है।

इस लिहाज से डॉ. कर्ण सिंह का दावा सबसे मजबूत माना जा रहा है। उनके कद को हाईकमान के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं है और कार्यकाल भी चार साल बचा है। वैसे वरिष्ठता के लिहाज से पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी भी हाईकमान और पार्टी का भरोसेमंद चेहरा हैं। मगर लोकसभा में विपक्ष की हैसियत से मरहूम कांग्रेस के लिए एंटनी की नरम राजनीति का जोखिम राज्यसभा में नुकसान का सौदा साबित हो सकता है। एंटनी का अच्छा वक्ता नहीं होना और हिंदी बोलने में असमर्थता भी उनकी दावेदारी के आड़े आती है। ऐसे में कर्ण सिंह की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। कर्ण सिंह का विपक्षी दलों में ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के बीच भी सम्मान है। वैसे मोदी सरकार से सीधे सियासी मुकाबले के लिए दिग्विजय सिंह का नाम भी चर्चा में है। वह हाल ही में राज्यसभा में आए हैं और उनके पास छह साल का कार्यकाल है।
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क्षेत्रीय दलों की जूनियर टीम बनने को तैयार कांग्रेस

संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस ने भले ही कई क्षेत्रीय दलों की अगुवाई कर मोदी सरकार को घेरने में सफलता हासिल की हो लेकिन अब उसे राज्यों में इन पार्टियों की जूनियर टीम बनकर इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। दरअसल, कांग्रेस में वजूद बचाने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु समेत कई अन्य राज्यों में दूसरे दलों के साथ गठबंधन करने पर विचार हो रहा है। इन सभी राज्यों में पार्टी गठबंधन करती है तो जाहिर तौर पर वह क्षेत्रीय दलों की जूनियर टीम होगी। प्रदेश कांग्रेस इकाइयों के कड़े विरोध के बावजूद पार्टी हाईकमान यह कीमत चुकाने का खतरा उठाने का मन बना रहा है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी हाईकमान पर सपा के साथ अगले विधानसभा चुनाव में गठबंधन करने का दबाव बना रहे हैं। सपा की मदद से ही कांग्रेस के प्रमोद तिवारी और पी एल पुनिया को राज्यसभा की सदस्यता मिल सकी है। सूत्र कहते हैं कि सपा भी इसके लिए इच्छुक मानी जा रही है। 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दोनों दलों के बीच बातचीत हो सकती है। बात तो बसपा से भी चल रही है लेकिन मायावती के मुकाबले मुलायम सिंह यादव के साथ तालमेल को पार्टी रणनीतिकार ज्यादा फायदेमंद मान रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस अगले चुनाव में गठबंधन कर सकती है। शारदा चिट फंड घोटाले के चलते बैकफुट पर खड़ीं ममता भी कांग्रेस को लेकर नरम हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इसका विरोध किया है। उनका कहना है कि हाईकमान को फैसला लेने का हक है लेकिन तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से पार्टी के कार्यकर्ताओं को निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि वे जमीन पर ममता सरकार के निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। बिहार में तो कांग्रेस पहले से ही लालू यादव और नीतीश कुमार की जूनियर बनने के लिए तैयार है। पिछले साल विधानसभा उपचुनाव में यह समीकरण देखने को भी मिला था।

तमिलनाडु में भी कांग्रेस द्रमुक के साथ फिर से गठबंधन करने पर विचार कर रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री जी के वासन के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी कमजोर पड़ी है। इसीलिए द्रमुक के साथ गठबंधन कर शर्मनाक स्थिति से पार्टी को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले महीने खत्म हुए संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान राज्यसभा में कांग्रेस ने लगभग नौ पार्टियों की अगुवाई कर मोदी सरकार को घेरा था। संसद की कार्यवाही कई दिन बाधित की। सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, जदयू, राजद और वामदलों के साथ रणनीति बनाकर कांग्रेस ने मोदी सरकार के कई महत्वपूर्ण बिलों को पारित नहीं होने दिया था।
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