वरावरा राव हिंदुस्तान में वामपंथी राजनीति का एक जाना पहचाना नाम हैं। उन्हें नक्सलियों के हमदर्द, एक कवि, एक लेखक और एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है।
वरावरा राव भारत की कम्यूनिस्ट पार्टियों की आलोचना करते हैं और उनका मानना है कि विभिन्न कम्यूनिस्ट पार्टियों ने भारत के शोषित समाज से गद्दारी की है क्योंकि सत्ता पाने के लिए ये पार्टियां हमेशा भारत के संविधान, चुनावी राजनीति और कांग्रेस की ओर देखती हैं और इन्होंने शोषितों के हितों की अनदेखी की है।
पेश है वरावरा राव से मनीष तिवारी की एक खास मुलाकात, जिसमें उन्होंने तेलंगाना और वहां के शोषितों के बारे में अपनी राय जाहिर की-
'नेहरू संसदीय कमजोरी के शिकार रहे हैं'
प्रश्न -भारत में वामपंथी राजनीति और कम्यूनिस्ट पार्टियों और उनके आंदोलनों को आप कैसे देखते हैं?
मैं इसे वामपंथी या लेफ्ट नहीं मानता हू। यह रेवोल्यूशनरी एक्सट्रा पार्लियामेंटरी पॉलिटिक्स है। कम्यूनिस्ट राजनीति का इतिहास मापुला, मलाबार और पंजाब के विद्रोहों के समय ही से सशस्त्र विद्रोह की राजनीति का रहा है।
लेकिन भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी और इससे जुड़े लोग, खासकर डांगे के समय से, नेहरू के समाजवाद और कांग्रेस की ओर देखते रहे हैं। वे औपनिवेशिक और संसदीय कमजोरी के शिकार रहे हैं, नहीं तो आपातकाल को भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के समर्थन से लेकर 2004 में प्रकाश करात का कांग्रेस को समर्थन नहीं होता।
कम्यूनिस्ट पार्टी तिलक, नेहरू, गांधी से लेकर मनमोहन सिंह और राजशेखर रेड्डी तक कांग्रेस की ओर देखती रही है और इसका अपना कोई वजूद नहीं बन पाया है।
तेलंगाना में जाति का प्रश्न कितना महत्वपूर्ण है?
तेलंगाना एक ऐसा राज्य बन रहा है जहां दलित, आदिवासी और मुसलमान लगभग 70 प्रतिशत से भी ज्यादा हैं। तेलंगाना की मांग यहां के मूल निवासियों ने जमींदारों और बड़ी जातियों के प्रभुत्व और दमन से तंग आकर करनी शुरू की थी।
आज वही जातियां और समूह नए तेलंगाना में भी उतने ही शक्तिशाली और दमनकारी हैं। और हां, इस बार इनके साथ भूमंडलीकरण और बाजार की शक्तियां भी जुड़ गयी हैं, जो स्थिति को और भी भयंकर बना रही हैं। साथ ही ये शक्तियां हिंदुत्व को भी अपने साथ ला रही हैं।
यह केवल भाजपा ही नहीं कर रही है, तेलंगाना राष्ट्र समिति, कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी भी इसमें इनके साथ हैं। यह नए तेलंगाना में अस्थिरता और तनाव पैदा करेगा।
जाति और संप्रदाय की राजनीति
प्रश्न -आपने हिंदुत्व की बात की, कैसे हिंदुत्व आ रहा है और इससे समस्याएं क्या हैं?
भारत में चुनावी राजनीति आज जाति की हदें पार कर चुकी है और अब संप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है।
इसकी जड़ें भारत की संसदीय और चुनावी राजनीति में ही हैं क्योंकि जब आपको सबसे ज्यादा संख्या चाहिए तो लोगों को अपनी ओर लाने के लिए आपको उन्हें विभाजित करना होगा। सीपीएम और कम्यूनिस्ट पार्टियों ने भी यही किया। और यही अंग्रेजों ने भी किया था।
आज इस सांप्रदायिक फॉर्मूले को भूमंडलीकरण और बाजार की शक्तियों से ऊर्जा मिल रही है। जब तक यह व्यवस्था रहेगी भारत से जाति और संप्रदाय की राजनीति खत्म नहीं हो सकती है।
इसके लिए दोषी कौन है?
आज कांग्रेस कहती है की मोदी नफरत फैला रहे है, वो समाज को बांट रहे हैं। खालिस्तानियों के ‘राज करेगा खालसा’ के जवाब में 1984 में हिंदी राज्यों में कांग्रेस और राजीव गांधी ने नारा दिया था, ‘हिंद करेगा हिंदू राज’।
31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई और लगभग एक महीने बाद, दिसंबर 1984 को भोपाल गैस कांड हुआ। उस उत्तेजित माहौल में क्या चुनाव टाला नहीं जा सकता था? पर कांग्रेस किसी भी तरह सत्ता पाना चाहती थी, उसने चुनाव कराए और पहली बार इतना बड़ा बहुमत मिला।
वह भी हिंदू राष्ट्रवाद की लहर थी। आज हिंदुत्व की जिस लहर पर मोदी सवार हैं, उसे लाने वाली तो कांग्रेस है। आज मोदी जब इस तरह की बातें करते हैं तो कांग्रेस अपना इतिहास भूल जाती है।
तेलंगाना राष्ट्र समिति में चंद्रशेखर राव
प्रश्न -तेलंगाना राज्य बनने में वामपंथी और नक्सली आंदोलन का क्या योगदान है?
तेलंगाना आंदोलन की शुरुआत सशस्त्र विद्रोह के रूप में 1930-40 के दशक में ही हुई थी और ‘नक्सल’ तो शब्द ही उसके बहुत बाद में आया। लंबे समय तक तेलंगाना और इससे सटे क्षेत्रों में एक सशस्त्र आंदोलन चला और इसने तेलंगाना की मांग को लगातार ऊर्जा दी।
इधर पिछले दशक में तेलंगाना की जो मांग उठी उसमें तेलंगाना राष्ट्र समिति, के चंद्रशेखर राव जैसे तत्व घुस आए और उन्होंने इन दलित-आदिवासियों को ठगा है। पूरे आंदोलन का जमीन पर नेतृत्व और इसे शक्ति प्रदान की दलित और आदिवासी छात्रों ने, जो लगभग नब्बे प्रतिशत हैं।
आज जब तेलंगाना राज्य बना है तब इन्हें दरकिनार कर दिया गया है। मुझे लगता है थोड़े दिनों में इनकी असलियत खुल जाएगी और लोगों का इनसे मोह भंग होगा।
तेलंगाना में दलितों और बहुजन आंदोलन
प्रश्न -तेलंगाना में दलितों और बहुजन आंदोलन को आप कहां पाते हैं?
आज तेलंगाना में बहुजन आंदोलन बहुत कमजोर है हालांकि तेलंगाना आंदोलन को ऊर्जा दलितों से ही मिली। 1940 और 1970-80 के दशक में तेलंगाना आंदोलन ने दलितों से ही शक्ति प्राप्त की किंतु बीच में वे भटक गए। 1989 में कांशीराम ने 300 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे।
उनमें से सिर्फ एक को छोड़कर, बाकी 299 की जमानत जब्त हो गयी थी। आज माला और दलित ईसाई जगन मोहन रेड्डी के साथ हैं, माडीगा टीआरएस या कांग्रेस के साथ हैं, पिछड़ी जातियां चंद्रबाबू नायडू के साथ हैं। कुल मिलकर दलित भटक गये हैं। तेलंगाना के हाल के आंदोलन का पूरा का पूरा नेतृत्व दलित छात्रों के हाथों में था, उन्होंने दमन सहा।
चंद्र बाबू नायडू ने कहा था कि तेलंगाना का पहला मुख्यमंत्री दलित होगा और उपमुख्यमंत्री मुसलमान, पर जब उन्हें सत्ता मिलने की उम्मीद है, तो सिर्फ अपने परिवार को आगे ला रहे हैं और खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।