चुनाव जीतने के लिए लड़े जाते हैं लेकिन शायद कांग्रेस पार्टी को हारने का अधिक दुख नहीं होगा या नहीं होना चाहिए। कहा जा रहा है कि देश में मोदी की लहर है। लेकिन लहर एक ही है और वह है कांग्रेस के खेमे में मायूसी की लहर।
मायूसी का आलम यह है कि अधिकतर वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से कुछ बोलना नहीं चाहते। पिछले दो आम चुनावों को जीतने के बावजूद इस बार पार्टी में आत्मविश्वास की ज़बरदस्त कमी है।
अब तक आने वाले चुनावी सर्वेक्षण पार्टी की करारी हार की भविष्वाणी कर रहे हैं जिससे पार्टी के मनोबल पर और भी असर हुआ है।
मीडिया में मोदी की कवरेज बढ़ी, कांग्रेस की घटी
अगर आप ने पिछले तीन महीनों से मीडिया पर नज़र रखी हो तो महसूस होगा कि राहुल गांधी और उनकी सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पर कवरेज कम से कम होती जा रही है।
अधिकतर मीडिया स्पेस नरेंद्र मोदी के नाम है और इसके बाद अरविंद केजरीवाल को दिया जा रहा है। ऐसा लग रहा है सत्ता में दस साल रहने के बावजूद इस चुनाव में कांग्रेस को ग्रहण लग गया है। कुछ विशेषज्ञों के विचार में कांग्रेस यह चुनाव हारने के मूड में है। चुनाव में शिकस्त कांग्रेस के स्वार्थ में है और यह इसके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है।
कांग्रेस हारने को तैयार हो सकती है लेकिन इसकी कोशिश यह होगी कि भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव जीत न सके। विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल का दिल्ली विधानसभा का चुनाव कांग्रेस की इस सोच को उजागर करता है।
भाजपा को रोकना कांग्रेस की कोशिश
चुनाव के बाद कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने में इसका बाहर से समर्थन किया लेकिन भाजपा के पास 'आप' से अधिक नंबर थे। कांग्रेस की कोशिश यह थी कि दिल्ली में किसी तरह से भाजपा की सरकार न बने।
यही मॉडल कांग्रेस केंद्र में भी अपना सकती है। अगर कांग्रेस की लगातार तीसरी बार सरकार न बनी, जिसके पूरे संकेत हैं, तो पार्टी की कोशिश होगी कि तीसरे मोर्चे को वह अपना समर्थन दे ताकि भाजपा को सरकार न बनाने दी जाए।
दूसरी तरफ कांग्रेस का रुख 'आप' के प्रति उतना बुरा नहीं है। राहुल गांधी तो सार्वजनिक तौर पर 'आप' की तारीफ़ कर चुके हैं। कांग्रेस की सोच यह है कि जितना अधिक मत 'आप' को मिलेगा उतना भाजपा को कम। यानी 'आप' भाजपा के वोट बैंक में सेंध मारेगी, जिससे भाजपा के सत्ता में आने का सपना अधूरा रह जाएगा।
क्या बदलाव के लिए हार जरूरी है?
कांग्रेस पार्टी में आम राय यह है कि राहुल गांधी पार्टी में ऊपर से नीचे तक मुकम्मल बदलाव लाना चाहते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर ऐसे गिने-चुने पुराने नेता हैं जो पार्टी में पूर्ण सुधार लाने की सालों से मांग करते आ रहे हैं।
उनके विचार में पार्टी को दोबारा मज़बूत करने के लिए इसमें पूरी तरह से बदलाव लाना ज़रूरी है। उनके ख्याल में इस बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए चुनाव में हार एक सुनहरा मौक़ा हो सकता है।
उन्होंने दावा किया है कि 2009 चुनाव में शिकस्त होती तो इस बदलाव पर अमल अब तक हो चुका होता लेकिन जीत के बाद बदलाव का इरादा रद्द कर दिया गया।
कांग्रेस में हावी है व्यक्तिवाद?
इस बार कांग्रेस की हार के आसार पिछले दो चुनाव से कहीं अधिक हैं। इस हार को जीत में बदलने के लिए कांग्रेस में सुधार लाना ज़रूरी है। राहुल गाँधी के कुछ क़रीबी लोगों के अनुसार इस हार से राहुल गांधी कमज़ोर नहीं मज़बूत होंगे।
यह हार, उनके लिए पुराने नेताओं को हटाने का एक बहाना हो सकती है। पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र की कमी है इसे सब जानते हैं।
हर फैसले के पीछे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के शब्द आखिरी होते हैं। राहुल गांधी को इस अंदरूनी लोकतंत्र को बहाल करना होगा।
दो कदम आगे, एक कदम पीछे
कांग्रेस पार्टी पहले भी चुनाव हार चुकी है। इस हार के कारण एक समय सोनिया गांधी राजनीतिक अंधकार में कई साल गुज़ार चुकी हैं। ऐसा लगने लगा था कि नेहरू/गांधी परिवार का अब अंत हो गया है।
लेकिन सोनिया ने पार्टी में बदलाव लाकर इसका पुनर्जन्म किया और पिछले दो चुनाव में जीत इसका गवाह है।
शायद राहुल गांधी को भी सियासी बनवास से गुज़ारना पड़ सकता है। लेकिन एक कदम पीछे हटने से ही वो दो कदम आगे बढ़ने में कामयाब हो सकते हैं।