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मोदी के दांव की काट निकाल नहीं पा रही कांग्रेस

Fri, 23 Aug 2013 12:02 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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खाद्य सुरक्षा विधेयक के मुद्दे पर कांग्रेस नरेंद्र मोदी की रणनीति की काट नहीं ढूंढ पा रही है। भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव बढ़ गया है।
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कांग्रेस रणनीतिकारों की मानें तो खाद्य सुरक्षा के विधेयक पर भाजपा सीधे गुजरात से नियंत्रित हो रही है। सरकार के मैनेजरों का कहना है कि लोकसभा में हंगामे की वजह बने आंध्र प्रदेश के सांसदों के निलंबन के प्रस्ताव पर भाजपा बिल्कुल तैयार थी।

विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इसकी रजामंदी लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को भी दे दी थी। मगर ऐन वक्त पर भाजपा पलट गई। अब सरकार को शुक्रवार को सुबह स्पीकर की ओर से बुलाई सर्वदलीय बैठक में ही कोई नतीजा निकलने की उम्मीद है।
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सरकार के मैनेजरों की माने तो आंध्र प्रदेश के सांसदों के निलंबन को लेकर सुषमा स्वराज और भाजपा के यशवंत सिन्हा ने रजामंदी दे दी थी।

रणनीति बनी थी कि सरकार जब निलंबन का प्रस्ताव रखेगी तो भाजपा वाकआउट कर सरकार को इस सिलसिले में प्रस्ताव पारित करने का मौका दे देगी। मगर सदन में भाजपा का कुछ अलग ही रूप देखा गया।

कांग्रेस के एक शीर्ष पदाधिकारी और लोकसभा सदस्य ने कहा कि भाजपा के पलटी खाने के बाद जब स्पीकर ने अपने केबिन में विपक्ष की नेता से पूछा कि आपने तो निलंबन के प्रस्ताव पर सरकार का साथ देने की बात कही थी। मगर आप तो विरोध करने लगे। तो सुषमा का जवाब था कि भाजपा सदस्यों का अचानक ही मूड बदल गया। अब वह क्या करें।

कांग्रेस के एक मैनेजर ने कहा कि लोकसभा में सुषमा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली बिल को पास करवाने के हक में हैं। मगर गांधीनगर में बैठे मोदी ऐसा नहीं चाह रहे हैं। वह लगातार भाजपा में बैठे दिल्ली नेतृत्व को बिल को पास नहीं करवाने के निर्देश दे रहे हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता संदीप दीक्षित ने कहा कि विपक्ष बिल को पारित नहीं करवाने के बहाने ढूंढ रहा है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात की भाजपा सरकारें अपने किसी प्रस्ताव को मंजूर करवाने के लिए एक साथ कांग्रेस के कई विधायकों को पूरे सत्र के लिए ही निलंबित कर देती हैं और अब ये यहां सांसदों के विशेषाधिकार की बात कर रहे हैं।
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हालांकि केंद्र सरकार ने हिम्मत नहीं हारी है। विपक्ष को मनाने की कोशिश मे सरकार फिर से जुट गई है। जबकि संसद सत्र को पांच सितंबर तक बढ़ाने के प्रस्ताव के जरिए भी वे अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है, ताकि उसे बिल को मंजूर करवाने के लिए ज्यादा समय मिले।
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