1991 के बाद यह पहला ऐसा मौका होगा, जब तमिलनाडु से संसद में डीएमके का कोई भी सांसद मौजूद नहीं होगा।
जबकि 1998 के बाद से कांग्रेस का भी कोई सांसद सदन में नहीं होगा। राज्य की 39 सीटों में से 37 पर अन्नाद्रमुक और 2 पर भाजपा ने बाजी मारी।
1996 में देवगौड़ा सरकार के बाद से ही डीएमके हमेशा ही केंद्र में बनी रही थी। इससे पहले पार्टी को 1989 और 1991 में लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं मिली थी। जबकि 1962 से 1984 तक डीएमके के प्रतिनिधि संसद में रहे।
इसी तरह 1967 में विरोधी लहर के बावजूद कांग्रेस यहां से तीन सीटें जीतने में कामयाब रही थी, लेकिन 1996 व 1998 के बाद एक बार फिर कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी।
यही नहीं तमिलनाडु से माकपा व भाकपा का कोई भी उम्मीदवार नहीं जीता।