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भारत-जापान के बीच बढ़ती नजदीकियों से चिंतित है चीन?

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चीन की राजधानी बीजिंग में जहां एक ओर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया गया वहीं दूसरी ओर भारत की राजधानी दिल्ली में 'संघर्ष टालने और पर्यावरण चेतना के लिए वैश्विक स्तर पर हिंदू और बौद्ध पहल' पर अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन किया गया।
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एक ही दिन एशिया के दो पड़ोसी देशों की राजधानी में शुरू होने वाले इन कार्यक्रमों में कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इनका आयोजन एक संयोग है या फिर इससे कुछ और संकेत मिलता है? किंग्स कॉलेज लंदन में डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस स्टडीज के प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं कि तनावपूर्ण स्थिति से गुजरते एशिया में हो रहे इन दो कार्यक्रमों को एक संयोग से ज्यादा राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। वो कहते हैं, "चीन अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। वो दूसरे विश्व युद्ध में जापान की जो भूमिका रही है, उससे अपने आपको अलग दिखाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं बुद्धिज्म को मानने वाले भारत और जापान अपना पक्ष रख रहे हैं कि दुनिया की राजनीति ऐसे समय से गुजर रही है जिसमें इन धर्मों और संस्कारों का एक नया मतलब निकल कर आता है।" पंत कहते हैं कि चीन अपनी भूमिका के लिए सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है जबकि नई दिल्ली में हो रहा संवाद मानवीय दुनिया की राजनीति के लिए मार्गदर्शक बन सकने वाले मानवता संबंधी पक्ष को सामने रख रहा है।
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चीन है नर्वस

नई दिल्ली में हो रहे 'संवाद' को भारत और जापान के रिश्तों को बेहतरी के तौर पर भी देखा जा रहा है। हर्ष पंत मानते हैं कि भारत और जापान के क़रीब आने से चीन नर्वस दिख रहा है।

पंत कहते हैं, "चीन इस बात से प्रभावित है। काफी नर्वस भी है कि एशिया की दो बहुत बड़ी शक्तियां भारत और जापान एक साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी विदेश नीति का एजेंडा काफ़ी मिलता-जुलता नजर आ रहा है।" पंत का आंकलन है कि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का रणनीतिक नजरिया और विदेश नीति में समानता है।

भारत और जापान ने एक-दूसरे को प्राथमिकता बनाया है। उनका कहना है कि चीन ये जानता है कि अगर ये दो शक्तियां साथ काम करने को तैयार हो जाती हैं तो उसके लिए काफी मुश्किल पैदा कर सकती हैं।
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सकारात्मक संदेश

हालांकि पंत मानते हैं कि नई दिल्ली में हो रहे 'संवाद' से दुनिया में सकारात्मक संदेश जाएगा और आगे इसमें चीन भी शामिल हो सकता है।

वो कहते हैं, "ये एक अच्छी पहल है। इसे अगर आगे ले जाएं तो इसमें चीन भी शामिल हो सकता है क्योंकि चीन में भी बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव है।"

साथ ही वो ये भी जोड़ते हैं कि अगर ये चीन बनाम भारत या फिर चीन बनाम बौद्ध और हिंदू धर्म का प्रोजेक्ट बन जाता है तो आगे चलकर काफी समस्या पैदा हो सकती हैं।
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