कोल ब्लॉक आवंटन पर संसद में घिरी यूपीए सरकार को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जबरदस्त फटकार लगाई।
इस घोटाले की सीबीआई जांच में सरकारी हस्तक्षेप के खुलासे पर शीर्ष अदालत ने सख्त रुख में कहा कि अब उसका पहला काम जांच एजेंसी को राजनीतिक दखल से मुक्त कराना होगा।
मामले में खुद को अब तक अंधेरे में रखे जाने से बेहद नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी के स्टेटस रिपोर्ट का मसौदा सरकार के साथ साझा करने से जांच प्रक्रिया की नींव ही हिल गई है।
जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा की ओर से 26 अप्रैल को दाखिल हलफनामे में बहुत बेचैन करने वाली बातें हैं। इस जांच एजेंसी को स्वतंत्र बनाने और बाहरी दबावों से मुक्त करने की जरूरत है।
मालूम हो कि दो पन्नों के हलफनामे में सिन्हा ने कहा था कि आवंटन पर सीबीआई जांच की स्थिति रिपोर्ट कानून मंत्री अश्वनी कुमार, पीएमओ और कोयला मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को उनकी इच्छा के अनुसार दिखाई गई थी।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि सीबीआई को अपनी जांच में राजनीतिक आकाओं से निर्देश लेने की जरूरत नहीं है। 15 साल पहले विनीत नारायण मामले में सीबीआई की स्वतंत्रता को स्पष्ट किया गया था। आखिर क्यों अब तक एजेंसी स्वतंत्र नहीं हो पाई है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हमारी पहली कोशिश इस बात को लेकर होगी कि एजेंसी को राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त किया जाए। सीबीआई निदेशक ने अपने जवाब में रिपोर्ट के मसौदे को साझा किए जाना स्पष्ट किया और भरोसा भी दिलाया कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
लेकिन सीबीआई निदेशक का हलफनामा एडिशनल सॉलिसिटर जनरल हरेन रावल के दावे से बिल्कुल उलट है। पीठ ने कहा कि सीबीआई निदेशक यह बताएं कि जांच एजेंसी ने एएसजी के माध्यम से किस आधार पर यह बयान दिया था कि स्थिति रिपोर्ट किसी से साझा नहीं की गई।
अदालत ने सीबीआई से पूछा कि क्या कानून मंत्री और पीएमओ तथा कोयला मंत्रालय के अधिकारी कोयला घोटाले में एजेंसी की जांच रिपोर्ट मांगने के लिए अधिकृत हैं। इसके अलावा सीबीआई निदेशक को आदेश दिया कि वह चार मसलों पर हलफनामा दाखिल करें कि स्थिति रिपोर्ट में क्या बदलाव हुए थे और यह किसके कहने पर किए गए थे।
पीठ ने सीबीआई प्रमुख को आदेश दिया है कि वह 6 मई तक इस बात का स्पष्टीकरण दें कि 8 मार्च की स्थिति रिपोर्ट में इसका खुलासा क्यों नहीं किया गया था कि रिपोर्ट का मसौदा सरकार के साथ साझा किया गया। मामले की अगली सुनवाई 8 मई को होगी।
पीठ ने जानना चाहा कि सीबीआई ने 26 अप्रैल को दाखिल अपने हलफनामे में यह क्यों नहीं बताया कि मसौदा रिपोर्ट में क्या बदलाव किए और किसके कहने पर किए। अदालत ने कहा कि सीबीआई निदेशक को विशेष रूप से यह बताना होगा कि क्या रिपोर्ट का मसौदा कानून मंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिव के अलावा किसी और को भी दिखाया गया।
पीठ ने सीबीआई निदेशक को उस प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी देने के लिए कहा है जो प्रक्रिया वह जांच के दौरान स्थिति रिपोर्ट साझा करने संबंधी दिशा-निर्देशों के तहत अपनाती है।