आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न देने की बात कही जा रही है। अचानक नेताजी याद आ रहे हैं जबकि उन्हें उनकी जिंदगी में कुछ नहीं दिया। और मरने के बाद अब तक सरकारों ने कुछ नहीं दिया।
नेताजी और उनके सिपाहियों की उपेक्षा से सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के कैप्टन रहे अब्बास अली बेहद आहत हैं।
उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ में रह रहे 96 वर्ष के बुजुर्ग सेनानी कहते हैं कि आजादी के बाद जब आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को भारतीय फौज में शामिल करने की बात आई तो उस समय की सरकार ने कह दिया कि इनके शामिल होने से सेना का अनुशासन प्रभावित होगा।
यही नहीं आजादी के दशकों बाद तक हमें स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना गया। 1972 में हमें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया गया।
नेताजी की उपेक्षा से आहत हैं कैप्टन अब्बास अली
यही नहीं नेताजी की बेटी तीन बार भारत आई और किसी ने उसको तवज्जो नहीं दी। मैं तो कहता हूं कि भारत रत्न से पहले सरकार रूस की फाइलों में दबा उनकी मौत का राज सार्वजनिक करे।
आज भ्रष्टाचार से आहत कैप्टन नेताजी के नेतृत्व कौशल का जिक्र करते हुए कहते हैं कि अगर सुभाष बाबू जिंदा होते तो आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ते।
दुखी मन से कैप्टन कहते हैं कि यह कहा जाता है कि अगस्त 1945 में नेताजी सुभाष बाबू की फारमोसा प्लेन क्रैश में मौत हो गई। जबकि सितंबर 1945 के पहले हफ्ते में सिंगापुर के मेस में उन्हें मैंने अपनी आंखों से देखा है।
यह बात मैं कैसे मान लूं कि उनकी मौत प्लेन क्रैश में हुई है। यह सोची समझी रणनीति के तहत प्रचारित किया गया।
अब्बास अली की संघर्ष गाथा
- सुभाष बाबू की आजाद हिंद फौज में कैप्टन के पद पर रहे। 1944 में रंगून से अराफान कूच किया और अराफान की लड़ाई में हिस्सा लिया।
- अराफान में ही 6 महीने ब्रिटिश आर्मी को बंधक बनाए रखा लेकिन जापान के पास हवाई आक्रमण नहीं था। इसका फौज को नुकसान उठाना पड़ा।
- अंडमान की सेल्युलर जेल में तिरंगा झंडा फहराने वालों में से एक और स्वतंत्रता की घोषणा की।
- 1945 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बाद गिरफ्तार किए गए। मुकदमे में फांसी की सजा सुनाई गई। मुलतान के किले में बंद शहादत का इंतजार कर रहे थे कि नेहरू-माउंटबेटन समझौता हुआ और फांसी टल गई।