पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे उत्तर चौबीस परगना ज़िले के मधुसूदनकाटी गांव में रहने वाली मंजू सरकार को पीने का पानी ख़रीदना पड़ता था।
महंगाई के ज़माने में इस अतिरिक्त ख़र्च ने उनका गुजारा ज़्यादा मुश्किल बना दिया है। पर मंजू और राज्य के दक्षिणी इलाक़ों के 37 ब्लॉकों में रहने वाले दूसरे लोगों के पास कोई चारा नहीं था। उनके इलाक़े के पानी में आर्सेनिक मिला होने के कारण वह पीने लायक नहीं है। कम से कम आठ लाख लोग इस तरह का दूषित पानी पीने को मज़बूर हैं।
मंजू सरकार कहती हैं, “पहले हम लोगों को गहरे ट्यूबवेल का फिल्टर किया हुआ पानी मिलता था। यह शुरू में कुछ दिन तो ठीक चला, पर बाद में उसके इस्तेमाल से लोगों की सेहत ख़राब होने लगी। महंगा तो वह पानी भी था।"
बोतलबंद पानी बजट से बाहर
मंजू सरकार कहती हैं, "उसके बाद हम लोगों ने कुछ दिन तक बाज़ार का बोतलबंद पानी खरीदा। पर बजट के बाहर होने के कारण वह जल्दी ही बंद कर दिया गया।” आर्सेनिक मिले पानी का इस्तेमाल लंबे समय तक करने से लोगों की चमड़ी, बाल, नाखून सब कुछ खराब हो जाते है। आर्सेनिक का ज़हर जानलेवा माना जाता है। अब मंजू बहुत खुश हैं। अख़िर उनके गांव में पीने के पानी की पुरानी समस्या जो दूर हो गई है। अब गांव के सभी लोगों को सस्ता आर्सेनिक मुक्त पानी मिल रहा है।
"अब हम लोग पचास पैसे प्रति लीटर मिलने वाला ‘सुलभ’ पानी लाते हैं जो बिल्कुल साफ़ है,” उत्साहित मंजू कहती हैं।
एक नयी पहल
सुलभ इंटरनेशनल, मधुसूदनकाटी कृषक कल्याण समिति (एमकेकेएस) और एक फ़्रांसीसी ग़ैर सरकारी संगठन '1001 फाउटेंन्स’ ने मिल कर यहां बीते साल सुलभ सेफ ड्रिंकिंग वॉटर प्रोजेक्ट (एसएसडीडब्ल्यूपी) शुरू किया। यह एक नई और बेहद सस्ती तकनीक है। इसमें तालाब के पानी में फिटकिरी मिला कर उसे बालू और महीन कंकड़ों से गुज़ारा जाता है। फिर साफ़ पानी को अल्ट्रावॉयलेट ट्रीटमेंट के बाद क्लोरीन मिले पानी से धुली हुई बोतलों में भर दिया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया पर केवल 30 पैसे प्रति लीटर खर्च होता है। इस एक बोतल पानी की क़ीमत सिर्फ़ 50 पैसे है। मधुसूदनकाटी में लोगों का इलाज करने वाले डाक्टर सुबल चन्द्र सरकार ने बताया कि इस परियोजना के शुरू होने के बाद चर्मरोग, दस्त, पेट की दूसरी बीमारियों और स्त्रीरोग के मरीज़ो की संख्या में भारी कमी आई है।
बीमारियों से राहत
वे कहते हैं, "ये सभी बीमारियां आर्सेनिक मिला पानी पीने से होती हैं। इनका इलाज दवा नहीं बल्कि साफ़ पानी का सेवन ही है।" इस समस्या से निपटने के लिये पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रभावित इलाकों में करोड़ों रूपयों ख़र्च कर आर्सेनिक दूर करने वाले संयंत्र लगाए। पर हालत जस की तस हैं।
इस तरह के संयंत्र में पानी की सफ़ाई के दौरान आर्सेनिक जमा होता जाता है और नियमित देखरेख नहीं होने से बहुत जल्द यह संयंत्र खराब हो जाता है। लोगों को मज़बूरन आर्सेनिक मिला पानी या बोतलबन्द पानी इस्तेमाल करना पड़ता है।
अमूमन तालाब के पानी में आर्सेनिक नहीं होता है और यदि होता है तो उसकी मात्रा निहायत ही कम होती है। पर पश्चिम बंगाल के ज़्यादातर गांवों में तालाब का पानी नहीं पीया जाता है। इसकी वजह यह है कि इन तालाबों में ही इंसान नहाते हैं, मवेशियों को नहाया धुलाया जाता है और बर्तन, कपड़े वग़ैरह भी साफ़ जाते हैं।
आसान है इलाज
आर्सेनिक पर शोध के लिये मशहूर वैज्ञानिक और जादवपुर विश्वविध्यालय के प्रोफेसर दीपांकर चक्रवर्ती कहते है, "आर्सेनिक की समस्या से निपटने के लिए हमें गहरी खुदाई करके करोड़ों रुपए की लागत से तैयार होने वाले आर्सेनिक रिमूवल प्लांट्स की ज़रूरत नहीं है। यह काम तालाब या बारिश के पानी को साफ़ करने से भी सकता है। आर्सेनिक प्रभावित इलाक़ों मे बारिश भी काफ़ी होती है।”
इस परियोजना से मधुसूदनकाटी के आसपास के दूसरे पांच-छह गांवों को भी फ़ायदा है। यह तकनीक भारत की आर्सेनिक समस्या से निपटने में एक मील का पत्थर साबित होगी।