दिल्ली गैंगरेप पीड़िता को 'दामिनी' कहें या फिर 'अनामिका' या फिर भारत मां की अनमोल बेटी....वह हमलोगों को छोड़कर चली गई। साथ ही कई ऐसे सवाल छोड़ गई जिसका जवाब हमारे पास नहीं है। क्या हम इतने लाचार और मजबूर हैं कि अपनी मां, बेटी और बहन की सुरक्षा नहीं कर सकते?
दिल्ली गैंगरेप पीड़िता को बचाने की हर मुमकिन कोशिश नाकाम रही। उसकी मौत हो गई लेकिन उसके जीने का साहस देश के लिए एक मिसाल बन कर रहेगा। जिंदगी की जंग जीतने में नाकाम पीड़ित ने जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया था वो काबिले तारीफ़ है।
दरिंदगी की हद तक गुजरने के बावजदू उसने हर समय जीने का जज्बा दिखाया। वह चाहती थी कि बलात्कारियों को सजा मिले ताकि कोई और किसी की बेटी, बहन और बहू पर गलत नजर न डाले।
पीड़िता ने अपने भाई और मां को 19 दिसंबर की रात कहा था की 'मैं जीना चाहती हूं'। ये लोग पहली बार इस भयावह घटना के बाद उनसे मिले थे। 16 दिसंबर की रात चलती बस में छात्रा से गैंगरेप हुआ था। उस दौरान आरोपियों ने उस पर क्रूरता से हमला किया और उसके एक साथी से मारपीट की थी।
अपने पूरे इलाज के दौरान पीड़ित ने इशारों के जरिए बात करने की कोशिश की और जीने का जज्बा दिखाया। उसने अपने मां-बाप से बात भी की। इतना ही नहीं उसने दो बार मजिस्ट्रेट को अपना बयान भी दर्ज कराया।
सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान उसने मनोचिकित्सक की जांच में अपने सपनों के बारे में बताया था। इस अदम्य साहस और जीने के इस जज्बे को देखकर डॉक्टर भी हतप्रभ थे।
जब यह मामला बयान दर्ज कराने को लेकर विवादों में घिरने लगा तो उसने दुबारा अपने साथ हुई इस दुर्दांत घटना को बताया। वह बस चाहती थी कि आरोपियों को सख्त से सख्त सजा मिले और उसे न्याय। डॉक्टर ने उसके साहस को बहुत ही 'बहादुर' बताया। पीड़ित के डॉक्टर ने बताया की वो बेहद ही आशावादी और भविष्य को लेकर बेहद ही सकारात्मक सोच रखने वाली युवती थी।
23 वर्षीय पीड़िता को सफदरजंग अस्पताल में अधिकांश समय आईसीयू में ही रखा गया था। बाद में उसे सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया। वहां भी डॉक्टररों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे। पीड़िता ने स्थानीय समयानुसार शनिवार सुबह 4.45 (भारतीय समयानुसार 2.15) बजे दुनिया को अलविदा कहा। दुनिया छोड़ते वक्त उसके साथ परिवारवाले थे।