पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नींव रखते हुए गठबंधन की राजनीति को भविष्य की राजनीति बताया था। 2014 लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा ने उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक 40 से अधिक पार्टियों से गठबंधन किया। गठबंधन का नतीजा लोकसभा में 316 सीटों के रूप में सामने आया।
भाजपा 30 वर्षों बाद ऐसी पार्टी बनी थी, जिसे बहुमत से अधिक सीटें प्राप्त हु्ईं। लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा अपने दो अहम साझीदारों को गंवा चुकी है। हरियाणा में हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ भाजपा का गठबंधन मात्र तीन साल पुराना था, लेकिन शिवसेना और भाजपा की दोस्ती 25 साल पुरानी थी।
क्या ये महज संयोग ही है कि दोनों दलों ने अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा से किनारा किया? या फिर उद्घव ठाकरे की मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा गठबंधन की दुश्मन बन गई? क्या किसी और शख्स ने उद्घव को भाजपा से दोस्ती खत्म करने के लिए तो नहीं उकसाया?
अमित शाह की क्या है रणनीति?
अमित शाह ने चंद महीनों पहले भाजपा अध्यक्ष का पद संभाला था। पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने विरासत में अमित शाह को 40 पार्टियों का गठबंधन सौंपा था। शाह ने अध्यक्ष बनने के बाद विभिन्न राज्यों में भाजपा की इकाइयों को मजबूत करने के लिए सघन दौरे किए।
उसी समय उन्होंने विधानसभा चुनावों का बिगुल फूंकते हुए कश्मीर, झारखंड, हरियाणा और महाराष्ट्र में स्पष्ट बहुमत का लक्ष्य रखा। लोकसभा चुनावों की मिशन 272+ जैसी ही रणनीति ही विधानसभा चुनावों में दोहराने की रणनीति बनाई गई।
हरियाणा में भाजपा और हजकां ने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था और 55 विधानसभा सीटों पर भाजपा अन्य दलों से आगे रही थी। भाजपा के आंतरिक सर्वे में भी ये बात सामने आई की पार्टी हरियाणा में बहुमत पा सकती है।
अब नहीं रास आ रहे पुराने दोस्त?
आत्मविश्वास से भरे अमित शाह ने इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) की ओर से आए दोस्ती के प्रस्ताव को अनदेखा कर दिया। वैसे ये भाजपा को ही तय करना था कि भ्रष्टाचार के मामले में सजा पा चुके ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो को साथ रखे या नही।
पार्टी ने इनेलो जैसा ही रवैया हजकां के साथ भी अपनाया। सीटों को मुद्दा बनाकर भाजपा ने इनेलो ने भाजपा को दरकिनार कर दिया। हजकां अध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई ने सीटों के मसले पर बात करने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलकात करने का प्रयास भी किया।
बिश्नोई दिल्ली स्थिति भाजपा कार्यालय भी आए लेकिन शाह ने उन्हें मिलने का वक्त ही नहीं दिया। भाजपा ने उस वक्त कहा था कि बिश्नोई देर से आए और शाह के अन्य कार्यक्रम भी थे।
उद्घव जुबान पर नहीं रख सके लगाम
गठबंधन के मुद्दे पर बातचीत के लिए गुरुवार को अमित शाह को मुंबई जाना था। हालांकि शाह ने अंतिम समय में यात्रा रद्द कर दी। जिसके बाद गठबंधन का टूटना तय हो गया था।
शिवसेना और भाजपा गठबंधन के लिए 22 दिनों तक जद्दोजहद हुई। इस दौरान कई ऐसे मौके आए जब शिवसेना प्रमुख उद्घव ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए कई ऐसी बातें की, जो भाजपा में सर्वेसर्वा हो चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ थीं।
पिछले सप्ताह मुंबई में शिवसेना की कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के बाद शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने बचाया था। उद्घव ने कहा, 'मोदी को कौन जानता था। 2002 के दंगों के बाद उन्हें हटाने की बात की जा रही थी। लालकृष्ण आडवाणी, बाला साहब के पास आए और पूछा कि क्या किया जाए। बाला साहब ने कहा था कि मोदी का हटाया तो गुजरात गया।'
उद्घव के भाषण के बाद ही तय हो गया था कि भाजपा और शिवसेना में सबकुछ ठीक नहीं है।
आदित्य ठाकरे का मिशन 150 भी दोषी!
शिवसेना-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद उद्घव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने ट्वीट किया, गठबंधन टूटने का दुख हुआ क्योंकि पिछले 25 सालों में भाजपा के बुरे दिनों में भी हम साथ थे।
आदित्य की ये किसी भी राजनेता की टिप्पणी से कमतर नहीं थी। संकट के वक्त भी उन्होंने संतुतलित होकर जवाब देना मुनासिब समझा। हालांकि भाजपा नेताओं को बाल ठाकरे के पोते राजनीति में सक्रियता कम ही रास आई।
आदित्य ने शिवसेना के कार्यकर्ताओं के सामने मिशन 150 का लक्ष्य रखा था। आदित्य का कहना था कि शिवसेना 150 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, तो उद्घव ठाकरे को मुख्यमंत्री बना पाएगी।
आदित्य का मिशन 150 भाजपा और शिवसेना के बीच सबसे बड़ा रोड़ा बन गया। शिवसेना 150 से कम सीटों पर लड़ने के लिए तैयार नहीं हुई और भाजपा उन्हें 150 सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी। नतीजा गठबंधन की टूट के रूप में सामने आया।