भाजपा के ‘पितामह’ लालकृष्ण आडवाणी के कोपभवन में जाने के बावजूद पार्टी नरेंद्र मोदी को अगले चुनाव की कमान सौंपने के मामले में आगे बढ़ती दिख रही है।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इतना लगभग साफ हो चुका है कि भाजपा अब मोदी को पार्टी का चेहरा बनाएगी, लेकिन अब मामला इस पर टिका है कि आडवाणी का भी अनादर न हो और कार्यकर्ताओं की भावनाओं के अनुरूप फैसला हो जाए।
इसके लिए भाजपा के महारथी बीच का रास्ता तलाशने में जुटे हैं। हालांकि शुक्रवार को शुरू हुई ‘मोदी बनाम आडवाणी’ की जंग शनिवार को अपने चरम पर पहुंच गई।
आडवाणी ने अपने राजनीतिक कैरियर में पहली बार पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से किनारा कर लिया तो दूसरी ओर दिल्ली में मोदी समर्थकों ने आडवाणी के निवास पर प्रदर्शन कर नारेबाजी की।
पांच राज्यों के विधानसभा और लोक सभा चुनावों को लेकर रणनीति बनाने के लिए हो रही भाजपा कार्यकारिणी की बैठक आडवाणी-मोदी विवाद में उलझ कर रह गई है।
बैठक में हिस्सा ले रहे भाजपा के ज्यादातर नेता भी चाहते हैं कि मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी जाए।
बैठक के मेजबान व गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर ने मोदी के समर्थन में मैदान में कूदते हुए कहा कि उन्हें भाजपा का चेहरा बनाया जाना चाहिए। कमोबेश यही बातें यहां ज्यादातर नेता कह रहे हैं।
लेकिन आडवाणी के इस सियासी दांव के बाद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी अब कोई बड़ा ऐलान करने से पहले सभी की राय लेने में जुटे हैं। मोदी को लेकर कई सुझाव सामने आ रहे हैं।
पहला सुझाव है कि मोदी को समिति का अध्यक्ष बनाने की बजाय संयोजक बना दिया जाए। दूसरा यह है कि मोदी को अभी विधानसभा चुनावों की अभियान समिति की ही कमान दी जाए।
समिति का गठन करने का पूरा अधिकार राजनाथ के पास है, लेकिन उनकी दुविधा यह है कि एक ओर वरिष्ठ नेता आडवाणी हैं तो दूसरी ओर कार्यकर्ताओं का दबाव। कार्यकर्ता अब मोदी के नाम पर ना सुनने को तैयार नहीं हैं।
इसकी झलक दिल्ली में आडवाणी के निवास पर दिख चुकी है। कार्यकर्ताओं की मांग पर ही मोदी रविवार शाम यहां गोवा में बूथ स्तर के कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करेंगे।
दूसरी ओर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज समेत दर्जनभर नेता हैं जो आडवाणी के साथ खड़े हैं।
मोदी के सवाल पर पार्टी पूरी तरह से बंटी है और उनकी गैरहाजिरी में मोदी के नाम का ऐलान होने पर यह खेमा भविष्य में राजनाथ के लिए सियासी संकट पैदा कर सकता है।
भाजपा को जल्दी ही पांच राज्यों के विधानसभा और फिर लोकसभा की चुनावी जंग में जाना है।
भाजपा के एक नेता का कहना था कि ऐसे में बिखरी व बंटी भाजपा के लिए लोकसभा की चुनावी जंग में कांग्रेस को शिकस्त देना आसान नहीं रहेगा।
वैसे भी 2009 में भी राजनाथ सिंह ही भाजपा अध्यक्ष थे और तब भाजपा चुनावी जंग हार गई थी।
अब फिर 2014 सामने है और भाजपा की कमान राजनाथ के हाथ है। इसलिए वे अब मोदी के मामले में आडवाणी खेमे से सीधी टक्कर लेने से बच रहे हैं।
अभी नहीं तो कभी नहीं की है जंग
अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से हटने के बाद साल 2009 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के सामने अपनी अंतिम राजनीतिक इच्छा पूरी करने का एक बड़ा अवसर था।
मगर चुनाव में मिली करारी हार ने उनकी हसरत पूरी नहीं होने दी।
अब जब आडवाणी को लगता है कि साल 2014 उनकी प्रधानमंत्री बनने की अंतिम राजनीतिक इच्छा को पूरी कर सकता है तो नरेंद्र मोदी उनके सामने दीवार बन कर खड़े हो गए हैं।
आडवाणी इसे अपने करीब छह दशक के राजनीतिक कैरियर की अंतिम पारी खेलने का आखिरी अवसर मान रहे हैं। इसके अलावा आडवाणी के मन में जरूरत के समय मोदी के किनारा कर लेने की टीस भी है।