केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व की कमान युवाओं को सौंपने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में भी इसकी शुरुआत कर दी है।
प्रदेश में होने वाले उप चुनावों के लिए पार्टी ने अपने युवा सांसद योगी आदित्यनाथ को प्रचार की कमान सौंपी है। इस टीम में वरुण गांधी की बजाय योगी आदित्यनाथ को तरजीह दिए जाने को बड़े फैसले के तौर पर देखा जा रहा है।
पार्टी ने इससे पहले उन्हें अपना स्टार प्रचारक बनाया था लेकिन ये पहला मौका है जब उन्हें प्रदेश स्तर पर कोई बड़ा दायित्व दिया गया है।
विश्व प्रसिद्ध गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी और अंतरराष्ट्रीय हिन्दू महासंघ के अग्रणी नेता 42 वर्षीय योगी आदित्यनाथ खरी-खरी कहने वाले उन चुनिंदा नेताओं में से हैं जो कई बार अपने विचारों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी ही पार्टी के खिलाफ खड़े नजर आते हैं।
संसद में कॉमन सिविल कोड, धर्मांतरण या 'इंडिया दैट इज भारत' के स्थान पर संविधान में 'भारत दैट इज हिंदुस्तान' करने जैसे निजी विधेयक पेश करने या फिर 27 जिलों में फैले हिन्दू युवा वाहिनी जैसे अपने समानांतर संगठन के चलते वे हमेशा चर्चा में रहे।
योगी आदित्यनाथ प्रदेश में बड़ा जनाधार रखने वाले नेताओं में से एक हैं जो हर चुनाव में अपना वोट प्रतिशत बढ़ा लेते हैं।
योगी की विवादित छवि
गोरखपुर सीट से लगातार पांचवीं बार सांसद बने योगी की छवि आमतौर पर एक उग्र हिंदूवादी नेता की ही मानी जाती है।
इसके पीछे उनके राजनीतिक करियर में 1998 से लेकर 2004 तक आए कई विवाद जिम्मेदार हैं। 2007 में गोरखपुर में साम्प्रदायिक झड़प की कुछ घटनाओं के बाद तत्कालीन सपा सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा था जिसकी प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में उग्र प्रतिक्रिया भी हुई थी।
पिछले दिनों उनका कुछ वर्ष पूर्व आजमगढ़ की सभा में दिए गए एक भाषण का वीडियो वायरल हो गया था जिसमें वे यह कहते नजर आए कि अगर मुस्लिम समुदाय का कोई व्यक्ति एक हिन्दू लड़की को ले जाएगा तो बदले में हम 100 मुस्लिम लड़कियों को ले आएंगे।
तब योगी ने इसे साजिश करार देते हुए इसकी फोरेंसिक जांच की मांग की थी।
एक दिन बाद ही एक और वीडियो को लेकर अधिवक्ता शहजाद पूनावाला ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत दर्ज कराई जिसमें मंच पर योगी की मौजूदगी में कुछ अप्रिय टिप्पणियां की जा रही हैं।
हालांकि योगी का कहना है कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के खिलाफ हैं।
पार्टी के लिए उनका उपयोग
'हिंदुत्व और विकास' की अपनी घोषित प्राथमिकताओं के चलते उन्हें उप चुनावों की ज़िम्मेदारी देकर पार्टी उनकी सांगठनिक क्षमता का लाभ तो उठाना ही चाहती है, साथ ही प्रदेश में कुछ दिनों से दिख रहे नेतृत्व के खालीपन को भी भरना चाहती है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि योगी को सामने लाकर पार्टी एक तीर से कई शिकार करना चाहती है।
इन उप चुनावों में पूरे प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के हालात हैं उसमें योगी की हिंदुत्व वाली छवि भी पार्टी को फायदा दिला सकती है।
योगी बनाम सपा
सपा सरकार और नेतृत्व के खिलाफ बिजली, पानी और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर योगी हमेशा से हमलावर रहे हैं और चूंकि इन उप चुनावों में बसपा ने मैदान में न उतरने का फैसला किया है, इसलिए योगी और सपा आमने-सामने होंगे।
हालांकि खुद योगी मानते हैं कि इन उप चुनावों में पार्टी केंद्र सरकार के 100 दिनों के प्रदर्शन के बूते जीत हासिल करेगी।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "प्रदेश की जनता क़ानून व्यवस्था की भयावह अराजकता और बेतहाशा बिजली कटौती से गुस्से में है।
दूसरी तरफ उसने सौ दिन में मोदी सरकार के प्रदर्शन को भी देखा है। ये चुनाव प्रदेश सरकार के खिलाफ जनादेश की दूसरी चोट साबित होंगे।"