ऐसे सवाल थोड़े अटपटे जरूर लगते हैं मगर मौजूदा दौर में उनके जवाब जानने की कोशिश बेहद जरूरी है। हिन्दी पट्टी में किसी को अपमानित करने के लिए मां-बहन या बेटियों को लक्ष्य करके ही गालियां क्यों दी जाती हैं?
स्त्री को पूजने जैसी नसीहत देने की जरूरत ही किन हालात में पड़ी होगी? कन्यादान जैसी परम्पराओं के निहितार्थ भला क्या हो सकते हैं? बदलते समाज में नई चेतना की शुरुआत भले हुई है मगर ऐसे सवालों की चुनौतियां अपनी जगह बरकरार हैं।
इन चुनौतियों से निपटने की हर कोशिश बेटियों के खिलाफ वैचारिक प्रदूषण के खात्मे की पहल होगी। 'अमर उजाला' की 'बेटी ही बचाएगी' मुहिम को ऐसी ही पहल मानते हैं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल।
'कॉफी विद एडिटर' कार्यक्रम में बुधवार को प्रो. शुक्ल और तनिष्क के स्थानीय शो-रूम की मालकिन गीतिका अग्रवाल ने अपना नजरिया साझा किया।
प्रो. रामदेव
बेटियों के प्रति भेदभाव की मानसिकता के लिए शिक्षा को दोष देकर आमतौर पर लोग अपना पल्ला झाड़ लेते हैं मगर इसकी शुरुआत तो स्कूल से बहुत पहले घर-परिवार में ही हो चुकी होती है।
बल्कि वैज्ञानिक शोध के ताजा नतीजों पर गौर करें तो शिशु का अवचेतन गर्भ की अवस्था में ही इससे प्रभावित होने लगता है। स्त्रियों के प्रति असंवेदनशील, असहिष्णु या असंगत व्यवहार की स्पष्ट समझ किसी बच्चे में नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृति में तो यह भेद कहीं मिलता नहीं।
लेकिन अगर घर में स्त्री के प्रति अलग बरताव चलन में है तो बच्चे का अवचेतन इससे अछूता कैसे रह पाएगा? मेरा मानना है कि बच्चों से पहले अभिभावकों के नजरिये में बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है।
समाज में खासकर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में जितने भी अपशब्द चलन में हैं, लक्ष्य मां, बहन या बेटी ही होती है। ये अपशब्द बालमन में यह धारणा पैदा करते हैं कि स्त्री सिर्फ आक्रमण की वस्तु है।
बेटी चाहे जितनी कामयाब हो, उसे पराया धन ही कहते हैं। इससे भी ज्यादा अफसोसनाक यह कि पूरब के गांवों में बेटी को पराये घर की हांडी माना गया। हांडी, मतलब जिसे कोई गैर छूकर भी अपवित्र कर सकता है।
दरअसल किन्हीं अर्थों में विवाह और उसके साथ कन्यादान जैसी मान्यता का जुड़ा होना बेटियों के लिए बहुत बुरा है। यों बहुत कोशिश के बाद भी मूर्धन्य लोग कन्यादान के निहितार्थ का जवाब नहीं दे पाते मगर अलग-अलग किताबों के हवाले से जो मैं समझ पाया हूं, वह यह कि इस जन्म में कन्यादान करोगे तभी अगले जन्म में अपने विवाह के लिए कन्या पाओगे।
यानी अपने अगले जन्म का दाम्पत्य पक्का करने के लिए इस जन्म में अपनी बेटी को किसी वस्तु की तरह दान कर देना चाहिए। यों बेशुमार लोगों का तजुर्बा है कि मुश्किल वक्त में बेटों के मुकाबले बेटी कहीं ज्यादा साथ देती है। धर्म के नाम पर ऐसे तमाम दोष हैं, जिन्हें समाज ने मान्यता दे रखी है। इनकी पहचान करके जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके, उतना अच्छा।
कहा गया कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' मगर यह गौर करना भी तो जरूरी है कि आखिर ऐसा कहने की जरूरत क्यों पड़ी होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरखों ने समाज में नारी के प्रति दोयम दर्जे के व्यवहार से खिन्न होकर ऐसी नसीहत दी हो?
पर इस नसीहत की जरूरत तो अब भी है तभी तमाम आख्यानों-व्याख्यानों में विद्वान इसका हवाला देते मिलते हैं। पाराशर स्मृति पांच अवस्थाओं में अनुपयुक्त पति से छुटकारा पाकर स्त्री को पुनर्विवाह की छूट देती है, इसका जिक्र कितने लोग करते हैं भला?
'एक बेटी की नियति शादी ही क्यों और बेटे की क्यों नहीं? इस धारणा को तोडऩा होगा। अपशब्दों का लक्ष्य भी बेटियां ही क्यों बनें? आइए शपथ लें, ऐसे किसी भी विचार अथवा कृत्य के विरोध का। बेटियों को न्याय दें। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्हें जरूर बचाएं।
गीतिका
यों बेटियां हर क्षेत्र में बुलंदियां छू रही हैं लेकिन उनके प्रति समाज की धारणा अब भी नहीं बदली है। मतलब सोच का यह बदलाव अभी बहुत सीमित है। तभी न घर में, स्कूल-कॉलेज में या बाहर कहीं भी लड़कियों को जब-तब अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ता है।
हां, उन सभी के हौसले की दाद देनी चाहिए जो इन सबके बाद में अपना मुकाम तलाश पा रही हैं। समाज की सोच बदले, इसके लिए लड़कियों के प्रति उपेक्षा का भाव छोडऩा होगा।
जबकि देखा जाए तो हकीकत इसके उलट है। जिन घरों में सिर्फ बेटी होती है, वह बेटे की जिम्मेदारी भी निभाती है। हां, भेदभाव की दूषित सोच में दहेज जैसी प्रथा काफी हद तक जिम्मेदार है। कमाने वाली लड़की का भी विवाह करने से पहले मां-बाप दहेज की प्लानिंग करते हैं। दहेज के रिवाज से छुटकारा भी बेटियों के हक में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकेगी।
यह धारणा इस कदर मजबूत है कि अगर अपनी बेटी नहीं होती तो लोग दूसरे की बेटी के ब्याह में कन्यादान करके 'पुण्य' पा लेते हैं। मेरी समझ में दूसरा अहम पहलू यह है कि बेटियों को दुनिया देखने-समझने या अपने तौर पर अनुभव हासिल करने की आजादी नहीं है। शाम के छह बजे के बाद अगर वह घर लौटे तो घरवाले सवालों की झड़ी लगा देते हैं जबकि बेटों से अक्सर कोई सवाल नहीं पूछता।
संस्कृति के नाम पर ऐसी तमाम बंदिशें है, जिनके चलते बेटियों के साथ न्याय नहीं हो पाता। अभिभावकों को चाहिए कि स्कूल से लौटी बेटी से पढ़ाई के अलावा स्कूल के अनुभवों पर भी बात करें? सहपाठियों और शिक्षकों के व्यवहार पर गौर करें? उसे हर स्पर्श का मतलब समझाएं और खुद आदर्श आचरण की मिसाल बनें। उसका हौसला बढ़ाएं। सही अर्थों में बदलाव की शुरुआत इसी तरह हो सकती है।
'बेटियों को सीखने दें बाहरी दुनिया से और इसके पहले उन्हें सिखाएं। वैसे ही जैसे बेटे को सिखाते हैं। फिर हर बेटी साबित करेगी, पीटी उषा और कल्पना चावला जैसी बनने की क्षमता। शपथ लें कि बेटी की तरक्की में आने वाली हर बाधा हटाने की कोशिश करेंगे।