सच! बहुत प्यारी और हिम्मती बिटिया है आरती। विकलांगता को तो मात दी ही, मुफलिसी भी उसके हौसले को तोड़ नहीं पाई। घर का दीपक बनकर पांच भाई-बहनों का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाया, साथ ही एमए फर्स्ट क्लास से पास करके मां-बाप का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
मेंहदावल के ठाकुरद्वारा मोहल्ले में रहने वाले सुभाष फेरी लगाकर आजीविका चलाते हैं। आमदनी इतनी नहीं है कि ढंग से पूरा कुनबा पाल सकें। जन्म से ही दोनों पैरों से विकलांग आरती और चार बच्चों की अच्छी परवरिश सुभाष के लिए कम बड़ी चुनौती नहीं थी।
किसी तरह जिंदगी की गाड़ी चलती रही। आठवीं दर्जे तक पहुंचते-पहुंचते नामुराद तंगी ने आरती की पढ़ाई रोक दी तो आरती ने इस चुनौती को स्वीकार किया। पढ़ाई के साथ घर की जिम्मेदारी भी अपने कंधे पर उठाने का फैसला किया।
इस फैसले से आरती का बचपन जरूर परिवार की जिम्मेदारियों में खो गया मगर आखिरकार वह सफल हुई। आठवीं की पढ़ाई के साथ-साथ बहनों पूनम, किरन, माया और भाई मिथुन व गणेश की पढ़ाई के लिए आरती ने माता मंदिर में पूजन सामग्री की दुकान शुरू कर दी।
यह सिलसिला उसकी स्नातक की पढ़ाई तक चला। स्नातक पास करते ही कस्बे के एक क्लीनिक पर नौकरी कर ली। यहां पर्ची काटने के लिए 2000 रुपये महीना मिलते। इसी से अपनी राह तलाशते हुए आरती ने संस्कृत से एमए करने के लिए मेंहदावल के सनातन धर्म महाविद्यालय में दाखिला लिया।
यहां वर्ष 2012 में प्रथम श्रेणी में एमए पास किया। अब संस्कृत से पीएचडी कर डिग्री कॉलेज में शिक्षक बनना उसका सपना है। व्हील चेयर के सहारे सभी बाधाओं को पार करने वाली आरती की छोटी बहन पूनम की दो साल पहले शादी हो गई। जबकि किरन 11वीं, माया 8वीं, मिथुन 7वीं और गणेश छठी कक्षा में है।
आरती की मां बच्ची देवी को अपनी लाडली पर नाज है। बकौल मां, बेटी और बेटे में कोई फर्क नहीं है। मां-बाप की असली छांव तो बेटियां ही हैं।