मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मेरी बेटी ने अभिनय की हमारी विरासत को मेरे बेटों से ज्यादा मजबूती से संभाला और आगे बढ़ाया है। मेरे बेटों लव और कुश के साथ-साथ सोनाक्षी ने भी कभी विलासिता की तरफ खुद को नहीं जाने दिया।
मैंने उसकी परवरिश में भी कभी किसी तरह का भेदभाव नहीं किया, हां उसे लेकर मैं ज्यादा सतर्क रहता था, क्योंकि बेटियां अक्सर पिता के ज्यादा करीब होती हैं। मगर वह हमेशा मेरी उम्मीदों पर खरी उतरी है और अब तो वह मेरी सिर्फ आन ही नहीं शान भी है।
उसने अपने आप को जरूरतों के हिसाब से बखूबी ढाला है। उसके दिमाग में कहीं भी मेरी बेटी होने का फितूर नहीं रहा। बचपन से लेकर कॉलेज में पढ़ाई तक उसने न तो अपने सहपाठियों और न ही अपने शिक्षकों को ये जताने की कोशिश की कि वह किसकी बेटी है?
सोनाक्षी मेरा सम्मान है और ये बात खुद सोनाक्षी अच्छी तरह से जानती है। वह ऐसा काम कभी नहीं करेगी, जिससे मुझे कष्ट हो या मुझे उसके बारे में किसी तीसरे से कुछ सुनना पड़े। बच्चों में संस्कार आप प्लानिंग करके नहीं डाल सकते।
आपको अपने बर्ताव और चाल-चलन से बच्चों को प्रभावित करना होता है। जैसा आप करते हैं, घर में जिस तरह की कमाई का अन्न लाते हैं, बच्चों का भविष्य वैसा ही बनता जाता है। अपने पेशे के प्रति पूरी ईमानदारी और किसी के साथ अन्याय किए बिना की गई कमाई की सोनाक्षी भी पक्षधर हैं।
मैं अपने बच्चों पर नाज करता हूं, फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बेटी है या बेटा। सोनाक्षी तो शुरू से हरफनमौला रही है। ऑटो में घूमना, मेट्रो से सफर करना, उसे भाता है।
मेरा भी मानना है कि हमें आम लोगों के बीच ज्यादा से ज्यादा रहने की आदत डालनी चाहिए और यातायात के सार्वजनिक वाहनों का उपयोग इसका सबसे आसान तरीका है। इंसान को मशहूर हो जाने के बाद भी इंसान तो बने ही रहना चाहिए।
सोनाक्षी को लुटेरा में देख मुझे अपने और अपने से पहले ज़माने की भी वे तमाम हिंदी फिल्म नायिकाएं एक के बाद एक याद आती रहीं, जिन्होंने अपने अभिनय से प्रसिद्धि हासिल की न कि जिस्म की नुमाइश करके।
मुझे खुशी है कि सोनाक्षी हिंदी सिनेमा की उन नायिकाओं की विरासत को आगे बढ़ा रही है, जिनका जोर अभिनय पर ज्यादा हुआ करता था। वह भारतीय नारी की उसी छवि को हिंदी सिनेमा में आगे बढ़ा रही है। लोग उसे बिहारी बिटिया कहते हैं, तो मुझे गर्व महसूस होता है।