यह बेटी है, गांव में रहने वाली। बीए फाइनल ईयर की छात्रा है। लेकिन काम ऐसा कि पूरा गांव उसके पीछे खड़ा है। वह स्कूल न जाने वाले बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दे रही है।
इतना ही नहीं, बच्चों की पढ़ाई पर आने वाला खर्च भी खुद वहन करती है। वह भी एक या दो बच्चों का नहीं, बल्कि पूरे 178 का। है न कमाल के हौसले वाली सिसौला कलां की 18 वर्षीय बीना पंवार।
बीना ने दूसरे बच्चों को पढ़ाना अपने जीवन का ध्येय बना लिया है। वह मेरठ स्थित फैज-ए-आम डिग्री कॉलेज में पढ़ रही है। उसके इस नेक काम में छोटी बहन सना भी सहयोग कर रही है।
सना पॉलिटेक्निक की छात्रा है। इस समय उसके पास गांव के गरीब परिवारों के 178 बच्चे पढ़ने आते हैं। इनमें से कई के सिर पर पिता का साया भी नहीं है। उनके घर की माली हालत बेहद खराब है।
सही न गई शिक्षा से दूरी
बीना शुरू में बचपन बचाओ संस्था में ग्राम पंचायत की मुखिया थी। इस दौरान उसने शिक्षा से बच्चों की दूरी को करीब से देखा। यह उससे सहा नहीं गया।
इसके बाद उसने स्कूल न जाने वाले अपने गांव के बच्चों के अभिभावकों से संपर्क किया। शुरू में तो बच्चों के परिजन पढ़ने के लिए भेजने को राजी ही नहीं हुए। गुजारिशों और समझाने के बाद बीना को कामयाबी मिली।
खुद जुटाए कॉपी-किताब के पैसे
बीना के पास पांच से बाहर साल तक के बच्चे पढ़ने आते हैं। शुरुआत यानी चार माह पूर्व उसके पास सिर्फ छह बच्चे पढ़ने के लिए आते थे। लेकिन अब उसके पास 178 बच्चे पढ़ने आ रहे हैं।
बीना बताती है कि शुरुआती दौर में उसके सामने बच्चों के लिए कॉपी-किताब को लेकर दिक्कतें आईं। लेकिन वह इसका हल निकालने में सफल रही। उसने रुपये जुटाकर 30 स्लेटें मगाईं। इसी तरह उसने किताबों का भी बंदोबस्त किया।
स्कूल से लौटते ही पढ़ाई
बीना खुद की पढ़ाई के लिए सुबह सात बजे कॉलेज जाती है। दोपहर में कॉलेज से लौटने के बाद वह बच्चों को पढ़ाने में लग जाती है। दो से चार और चार से छह बजे तक दो बैच में वह बच्चों को पढ़ाती है। अपनी पढ़ाई के लिए बीना ने रात का टाइम टेबल बना रखा है।
स्कूल खोलने की तमन्ना
बीना बीए के बाद बीएड करने की तैयारी में है। इसके बाद वह खुद का एक स्कूल खोलना चाहती है, जिसमें वह गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे सके।
बीना के माता-पिता को उसके इस काम पर नाज है। उनके मुताबिक, उनकी बेटी समाज में ज्ञान बांट रही है। उसके ज्ञान से कई बच्चों की जिंदगी संवर जाएगी।