केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत पढ़ाने के केंद्र के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने स्वागत करते हुए इसे अगले सत्र से लागू करने पर विचार करने को कहा है।
अदालत ने इसे सत्र के बीच में ही शुरू करने पर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि आप अपनी गलती के लिए छात्रों को क्यों दंडित कर रहे हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन पढ़ाने को त्रिभाषा के सिद्धांत का उल्लंघन करार देते हुए सत्र के बीच में ही उसकी जगह संस्कृत पढ़ाने का निर्देश दिया है।
अभिभावकों की एक याचिका पर शीर्ष अदालत ने सरकार से सत्र के मध्य में ही जर्मन की जगह संस्कृत शुरू नहीं करने पर विचार करने और इसे अगले सत्र से क्रियान्वित करने को कहा है। हालांकि, अदालत ने छठवीं से आठवीं तक संस्कृत पढ़ाने के फैसले का स्वागत किया।
जस्टिस एआर दवे की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र के उस दलील को खारिज कर दिया कि तीन साल पहले जर्मनी के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर गलत था और जर्मन तीसरी भाषा नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि आप अपनी गलती का दंड छात्रों को क्यों दे रहे हैं।
अदालत ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से इस बारे में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श कर फैसले को अगले सत्र से क्रियान्वित कराने को कहा।
अदालत ने कहा कि छात्रों और अभिभावकों के नजरिये से सोचिए। इस सत्र को पूरा होने दीजिए और अगले सत्र से इसे बेहतर तरीके से क्रियान्वित कीजिए। साथ ही अदालत ने संस्कृत पढ़ाने को एक अच्छा फैसला बताते हुए कहा कि हमें क्यों अपनी संस्कृति भूलनी चाहिए। संस्कृत के जरिए आप अन्य भाषाओं को आसानी से सीख सकते हैं क्योंकि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।