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तो बदल जाएगी कांग्रेस की पहचान!

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लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मुंह की खाने के बाद कांग्रेस में कायापलट की आवाज तेज होने लगी है। अपने-अपने गढ़ में कांग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्रियों के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद स्थानीय क्षत्रपों और पार्टी इकाइयों को ज्यादा ताकतवर बनाने की मांग उठने लगी है।
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इसके साथ ही कांग्रेस कार्य समिति में सदस्यों को नामित करने की परंपरा खत्म करने भी मांग हो रही है। अब इसमें चुनाव कराने की मांग पर जोर दिया जा रहा है। करारी हार के बावजूद पार्टी में आमूल-चूल बदलाव की भावना उफान पर है ताकि यह फिर से खड़ी हो सके और 2019 की चुनौती का सामना करने के लिए कायापलट कर सके।

भले ही पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ कोई बागी आवाज नहीं सुनाई पड़ रही हो लेकिन नेताओं का मानना है कि संगठन के अंदर जिम्मेदारी लेने को सर्वोच्च प्राथमिकता करार दिया जाना चाहिए।
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मुख्यमंत्रियों से हो पूछताछ

पार्टी के अंदर यह बात जोरशोर से उठ रही  है कि जो नेता और मुख्यमंत्री अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहे हैं उनसे वजह पूछी जानी चाहिए।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक पार्टी की कायापलट के लिए जरूरी है कि इसकी राज्य इकाइयों का चेहरा बदला जाए। स्थानीय क्षत्रपों को पार्टी में आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराना जरूरी है ताकि समय आने पर वे नतीजे दे सकें। भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन में क्षेत्रीय नेताओं को मिली ताकत की बड़ी भूमिका रही है।

कांग्रेस में लंबे समय से क्षेत्रीय नेताओं को दरकिनार किया जाता रहा है। दिल्ली में शीला दीक्षित के 15 साल के कार्यकाल में दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व का उदय ही नहीं हुआ। अगर हुआ भी तो आलाकमान से साठगांठ करके इसे किनारे कर दिया। इससे विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी मशीनरी बिल्कुल बैठ गई।

शीला दीक्षित के कद का नहीं कोई नेता

हालत यह है कि अब पार्टी की दिल्ली इकाई में शीला के कद का कोई नेता नहीं है जो भाजपा या आम आदमी पार्टी की चुनौती का मुकाबला कर सके।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों के बावजूद आलाकमान ने उन्हें केरल का राज्यपाल बनाकर उनका पुनर्वास भी कर दिया। यहां तक गोल मार्केट सीट पर करारी हार का स्वाद चखने के बावजूद राहुल गांधी ने उन्हें क्लीन चिट दे दी और उन्हें पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक करार दिया।

हिमाचल में वीरभद्र सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद आलाकमान ने इस ओर से आंखें मूंद लीं। नतीजतन जनता ने वहां कांग्रेस को हार का स्वाद चखा दिया। कई मामलों में मुख्यमंत्रियों से खराब प्रदर्शन या कुशासन की कोई कैफियत नहीं मांगी गई।

साथ ही प्रदेश इकाई के नेताओं को न तो स्वतंत्र तौर पर काम करने दिया गया और न ही उन्हें कोई अधिकार मिला। कांग्रेस नेतृत्व यह मोटा नियम भूल गया कि सरकार को पार्टी से ताकत मिलती है न कि सरकार से पार्टी को। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड में क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत ही नहीं होने दिया गया।

एक और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि कांग्रेस को अब अपने गिरेबान में झांकना होगा और राज्य नेतृत्व को ज्यादा अधिकार देने होंगे ताकि वे खुल कर काम कर सकें। नेतृत्व को अब ऊंचे नैतिक मापदंड अपनाने होंगे ताकि दागी तत्वों को कड़ा संदेश मिल सके।
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राहुल गांधी की कवायद को बढ़ाया जाए आगे

पार्टी नेता यह भी चाहते हैं कि कांग्रेस कार्य समिति में अब सदस्यों के नामांकन की परंपरा खत्म होनी चाहिए। पार्टी में अंदरूनी चुनाव की जो कवायद राहुल गांधी ने शुरू की है उसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। कांग्रेस कार्य समिति में भी यही फॉर्मूला अपनाया जाना चाहिए।

इस कदम का कई पुराने नेताओं ने विरोध किया था लेकिन अब पार्टी नेतृत्व को ऊपर से पूरा ढर्रा बदलने की कार्रवाई करनी ही होगी।

कांग्रेस कार्य समिति में समयबद्ध चुनाव कराने का एक्शन प्लान बनाना जरूरी है ताकि कार्यकर्ताओं में नेताओं की लोकप्रियता की परख हो सके। इससे स्थानीय नेता भी महसूस करेंगे कि पार्टी में उनकी राय की भी अहमियत है और वे खुद को ज्यादा अधिकार संपन्न महसूस कर सकेंगे।

साथ ही पार्टी को पूर्व मंत्रियों और राज्यसभा सदस्यों को यह जता देना होगा कि अगर उन्हें भविष्य की सरकार में मंत्री पद हासिल करना है तो लोकसभा का चुनाव जीत कर आएं।
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