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न मोदी लहर का अता-पता न नीतीश के सुशासन का तिलिस्म

Mon, 08 Jun 2015 10:47 AM IST
पटना से/ संजय मिश्र
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बिहार में राजनीतिक दलों के बीच बिसात बिछाने की भले ही होड़ मची हो मगर चुनाव की दहलीज पर खड़े इस प्रदेश में लोकसभा चुनाव की तरह फिलहाल किसी लहर की कोई आहट नहीं है। न ही मुद्दों की भीड़ में कोई एक बड़ा मुद्दा ऐसा दिख रहा जो चुनाव की तस्वीर बदल देने का माद्दा रखता हो।
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुशासन की अपनी पुरानी पोटली का साथ होते हुए भी सियासी जमीन पर संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं। तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विराट शख्सियत के सहारे नीतीश को सत्ता से बेदखल करनी की उम्मीद लगा रही भाजपा की चुनौतियां कम नहीं है क्योंकि 2014 के आम चुनाव में यहां हावी रही मोदी लहर का तिलिस्म फिलहाल यहां कहीं दिखाई नहीं दे रहा।

बिहार में नीतीश के मुकाबले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार मैदान में उतारने को लेकर अंदरूनी उठापटक से जूझ रही भाजपा के लिए मोदी लहर का तिलिस्म गायब होना चिंता का कारण बनता दिख रहा है। गांव-शहर के चौक चौराहों, चाय-पान की दुकान पर जारी राजनीतिक चर्चाओं में यह बात साफ सुनी जा सकती है कि यह मोदी का चुनाव नहीं बल्कि बिहार की नई सरकार के लिए चुनाव है। जैसा कि मोतिहारी के बलुआ चौक पर छह-आठ लोगों की मंडली के बीच चर्चारत युवा रीतेश कुमार कहते हैं कि मोदी जी का अच्छे दिन का वादा एक साल में हमें तो जमीन पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा और बिहार के चुनाव से उनका क्या लेना? वे देश चलाएं। जो वादा किया है उसे पूरा करें।
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सबको मालूम है कि वे बिहार का शासन चलाने तो आएंगे नहीं। कुछ ऐसी ही राय इसी जिले के एक गांव में कांट्रैक्ट टीचर अजय कुमार जाहिर करते हुए कहते हैं कि मोदी के चुनावी वादे अभी जमीन पर नहीं उतरे हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि फिलहाल पीएम को लेकर लोगों में नकारात्मक भाव नहीं है मगर दिल्ली विधानसभा चुनाव की तरह बिहार में भी मोदी का चेहरा वोट का आधार नहीं बनेगा।
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चुनावी जीत-हार गठबंधन की सफलता पर निर्भर करेगी

तो क्या नीतीश को उनके सुशासन का फायदा मिलेगा? राजनीतिक चर्चाओं के लिए चर्चित पटना के आर ब्लॉक चौराहे पर एक ऐसी ही चर्चा में शामिल रिजवान हसन ने कहा कि नीतीश के सुशासन की कहानी पुरानी पड़ चुकी है। राजनीतिक हकीकत यही है कि उनका सियासी भविष्य अब लालू प्रसाद के जनाधार पर निर्भर है। नीतीश का लोकसभा चुनाव के बाद इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को पहले सीएम बनाना और फिर उन्हें हटाकर खुद वापस लौटने का भी संदेश अच्छा नहीं गया है।

बिहार के आगामी चुनाव में जब न कोई लहर दिख रही है और न कोई एक बड़ा मुद्दा तो फिर चुनाव कौन सी करवट लेगा? इस अहम सवाल पर पटना के एक रिटायर प्रोफेसर केडी तिवारी कहते हैं निसंदेह 2014 जैसी कोई लहर नहीं है। एक बात साफ है कि बिहार के चुनाव में दो ध्रुवीय गठबंधन की तस्वीर बन रही है। इसमें जो खेमा गठबंधन को बिना कड़वाहट के जमीन पर अंजाम देगा उसको चुनाव में बढ़त मिलेगी।

प्रोफेसर तिवारी यह भी कहते हैं कि भले ही आम चुनाव जैसी कोई लहर नहीं है मगर भाजपा की बढ़ी ताकत से नीतीश और लालू समेत सभी विरोधी पार्टियों में डर है। यही डर राजद-जदयू-कांग्रेस और वामपंथी दलों को एक गठबंधन के नीचे आने को बाध्य कर रहा है। इस गठबंधन ने आकार लिया तो बिहार का चुनाव बेहद कांटे का और दिलचस्प होगा।   
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