आपसी रजामंदी से वयस्क समलैंगिकों के बीच सेक्स को अपराध नहीं मानने का मामला सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक पीठ के पास है। इससे यह तो जाहिर है कि इस तरह के रिश्तों से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
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मान लिया जाए कि मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक पीठ दो न्यायाधीशों के उस फैसले को पलट दे जिसमें 2013 में समलैंगिकों के खिलाफ धारा 377 के तहत कार्रवाई की अनुमति देने का फैसला आया था तो स्वाभाविक तौर पर यह कहा जाएगा कि समलैंगिकों को विवाह करने और बच्चे गोद लेने की इजाजत होनी चाहिए।
समाज पर क्या-क्या असर होगा
लेकिन यह मामला इतना आसान नहीं होगा, इससे कई सारे कानूनों को बदलने की नौबत आ जाएगी। यही वजह है कि बीते कई सालों से इस मामले को लंबित रखा जा रहा है।
ऐसे में सवाल यही है कि अगर समलैंगिंकों के बीच शादी को कानूनी मान्यता मिल जाए तो समाज पर क्या-क्या असर होगा। सबसे पहले तो यही होगा कि शादी, गोद लेने, पति-पत्नी के अलग होने और भरण पोषण के लिए पैसे देने से जुड़े कानूनों में बदलाव करने होंगे क्योंकि यह परिवार की परिभाषा को सीमित कर देता है।
यह माना जाता है कि परिवार का मतलब यह है कि एक पुरुष का विवाह एक औरत से होता है, उन्हें पति और पत्नी कहा जाता है। समलैंगिकों की शादी को अगर मान्यता दे भी दी जाए तो, उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि उनके बीच कौन पति की भूमिका में होगा और कौन पत्नी की भूमिका में।
तय करना होगा कौन 'पति' की भूमिका में है और कौन 'पत्नी' की
सवाल यह है कि इस तरह के जोड़े में तलाक होने की स्थिति में कौन भरण पोषण की मांग करेगा और किसे इसके लिए पैसे देने होंगे। इन रिश्तों को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि शादी की रजिस्ट्री में इन बातों का जवाब देना होगा।
शादी टूटने की हालत में अदालत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बच्चे के हितों की रक्षा करना होता है। कई फैसलों में पिता को बच्चा सौंप दिया गया है। पर मोटे तौर पर मां को ही बच्चा रखने का हक दिया गया है।
यह माना जाता है कि बच्चे की सही देख भाल मां ही कर सकती है। अदालत या विधायिका के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण यह फ़ैसला करना है कि
एक ही लिंग के दो वयस्क आपसी सहमति से कानूनन विवाह कर सकते हैं या नहीं। ऐसा होता है तो यह उस 'जोड़े' पर निर्भर करेगा कि वे आपस में यह तय कर लें कि कौन 'पति' की भूमिका में है और कौन 'पत्नी' की भूमिका में।अगर वे तय करें कि इस तरह के रिश्ते उन्हें मंजूर नहीं हैं तो उन्हें मौजूदा कानूनों की जरूरतों को पूरा करना होगा।
परिवार से जुड़े कानून में करने होंगे संशोधन
परिवार से जुड़े कई वैसे कानूनों में भी संशोधन करने होंगे, जिनमें 'पत्नी' या 'माता' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा समलैंगिक समुदाय के रिश्तों की नई सच्चाइयों के मद्देनजर करना जरूरी होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2014 के फैसले में कहा था कि संसद या विधानसभा से मिले अधिकारों की रक्षा के लिए 'हिजड़ा' को 'ट्रांसजेंडर' माना जाए। 'ट्रांसजेंडर' के अधिकारों को मानते हुए अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा था कि वह उनके लैंगिक पहचान को नर, मादा या तीसरे लिंग के रूप में कानूनी मान्यता दे।
अगर अदालत आपसी सहमति से एक ही लिंग के दो वयस्कों के बीच के रिश्ते को कानूनी मानती है तो वह इसी तरह की बात सरकार से भी कहे, इस पर कोई रोक नहीं है। ऐसा हुआ तो समलैंगिक समुदाय को विधायिका से पारित होने वाले किसी अलग क़ानून का इंतजार नहीं करना होगा।
संविधान से जुड़े मामलों के वरिष्ठ वकील पीपी राव मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ यह देखेगा कि याचिका में उठाए गए विषय से क्या कानून का कोई ऐसा सवाल जुड़ा है, जिसके लिए संविधान की व्याख्या जरूरी है।
संविधान खंडपीठ को सही लगा तो वह तीन साल पहले दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को ही उचित ठहरा सकती है। पर क्या अदालत यह कहेगी कि आपसी सहमित से यौन संबंध बनाने वाले एक ही लिंग के दो वयस्कों पर धारा 377 लागू नहीं किया जा सकता, तो उन्हें शादी करने का हक है?
राव का कहना है कि अदालत सिर्फ यह कह सकती है कि आपसी सहमति से सबंध बनाने वाले समलैंगिकों पर धारा 377 लागू होगा या नहीं। इससे ज्यादाकुछ नहीं।वे आगे कहते हैं, "बाकी का काम विधायिका का है, संसद का है।"
दूसरी ओर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और मशहूर वकील कपिल सिब्बल को उम्मीद है कि फैसला याचिका के पक्ष में होगा। वे सुप्रीम कोर्ट में 'क्यूरेटिव पिटीशन' यानी याचिका दायर करने वाले नाज फाउंडेशन का प्रतिनिधित्व करते है।
नाज फाउंडेशन का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील आनंद ग्रोवर को मुख्य न्यायाधीश ठाकुर ने कहा कि "यह हो सकता है कि नई बेंच अपने को क्यूरेटिव नियम की सीमा में सीमति न रखे।"
उन्होंने कहा, "समलैंगिक समुदाय के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए बेंच पूरे मामले के सभी पक्षों की सुनवाई कर सकती है।" कोई आश्चर्य नहीं कि इसके बाद कानून के विशेषज्ञ कहें कि अगर समलैंगिंकों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए रिश्ते गैर कानूनी नहीं हैं तो समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थिति देने में भी कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।