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खास हुआ भारत से रिश्ता, पहले लड़के का नाम रखा 'आजाद'

Fri, 14 Aug 2015 12:55 PM IST
रीता तिवारी/ अमर उजाला, कूचबिहार
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भारत और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक समझौते के तहत पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में स्थित 51 बांग्लादेशी भूखंडों के हजारों नागरिकों को वैसे तो 31 जुलाई की आधी रात को ही आजादी मिल गई थी। लेकिन इस आजादी का असली मतलब समझने के लिए उनको कोई 12 दिनों का इंतजान करना पड़ा है।
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इन सरहदी बस्तियों में से एक पोआटुरकुठी में आजादी के बाद पहली बार पैदा होने वाले शिशु का नाम ही आजाद रखा गया है। यह इन बस्तियों का पहला ऐसा शिशु है जिसने आजाद धरती पर सांस ली है और उसके जन्म प्रमाणपत्र में भी माता-पिता का असली नाम ही लिखा है।

पोआटुरकुठी की झरना बीबी (19) ने बुधवार सुबह बामनहाट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में आजाद को जन्म दिया है। झरना बीबी को सरहदी बस्तियों की अदला-बदली का बेसब्री से इंतजार था।
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मना जश्न

वह आजाद धरती पर अपने दूसरे शिशु को जन्म देना चाहती थी। आखिर उसकी यह मुराद बुधवार को पूरी हुई। (अमर उजाला ने झरना बीबी के बारे में 11 अगस्त को एक रिपोर्ट छापी थी।) इन सरहदी बस्तियों में कभी किसी शिशु के जन्म पर ऐसा जश्न नहीं मना था जितना आजाद के जन्म पर मना।

इसकी वजह यह थी कि बस्ती की महिलाओं को इससे पहले प्रसव के लिए फर्जी पतियों का सहारा लेना पड़ता था।झरना ने पहले ही तय कर लिया था कि आजाद देश में पैदा होने वाले अपने पहले बच्चे का नाम भी वह आजाद ही रखेगी। दो साल पहले बच्चे का जन्म होने पर झरना ने उसका नाम शहीद रखा था।

तब प्रसव से पहले वह सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों की निगाहों से बच कर कूचबिहार जिले के दिनहाटा स्थित अपने मामा के घऱ चली गई थी। प्रसव के समय अस्पताल में दाखिल होने के लिए उसे अपने पति का फर्जी नाम बताना पड़ा था। झरना ने तब अपने एक रिश्तेदार को अपना पति घोषित किया था।
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किया लंबा सफर तय

उसके बिना अस्पताल में उसे दाखिला ही नहीं मिलता।झरना के ससुर मुजीबुर अली कहते हैं, आजाद का जन्म इन सरहदी बस्तियों में नई सुबह का संकेत है। बुधवार तड़के प्रसव पीड़ा शुरू होने पर झरना के घरवाले उसे एक रिक्शावैन में लाद कर स्वास्थ्य केंद्र में ले गए। पंद्रह दिन पहले ऐसा करना उनके लिए असंभव था।

इसकी वजह यह थी कि बांग्लादेशी होने की वजह से सीमा सुरक्षा बल या पुलिस के जवान उको गिरफ्तार कर सकते थे। किसी सरकारी अस्पताल में दाखिला मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं था।

इससे पहले वर्ष 2010 में असीमा बीबी नामक एक महिला को प्रसव पीड़ा होने के बाद उसे दिनहाटा अस्पताल में भर्ती कराने के लिए सुरक्षा बल के जवानों और सरहदी बस्तियों के लगभग साढ़े तीन हजार लोगों के बीच कोई नौ घंटे तक जोर-आजमाइश हुई थी।

लोगों में फैली नाराजगी को ध्यान में रखते हुए असीमा को अस्पताल में दाखिल करने की अनुमित दी गई। उस समय पैदा होने वाले बच्चे का नाम जिहाद रखा गया था। जिहाद और आजादी के बीज पोआटुरकुठी के लोगों ने एक लंबा सफर तय कर लिया है।
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