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आडवाणी और मोदी की लड़ाई में अभी से हारी भाजपा

Tue, 11 Jun 2013 02:02 AM IST
नई दिल्ली/संजय मिश्र
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राजनाथ सिंह के अशोक रोड स्थित निवास पर सोमवार सुबह वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के निजी सचिव दीपक चोपड़ा की दस्तक भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित हुई। दस्तक देने वाले चोपड़ा अपने साथ आडवाणी का इस्तीफा लाए थे।
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इस्तीफा मिलते ही सकते में आए राजनाथ ने आनन फानन में पृथ्वीराज रोड स्थित आडवाणी के घर पहुंच गए। उन्हें देर तक इस्तीफा न देने के लिए मनाया। मगर जब तक राजनाथ पृथ्वीराज रोड से अपने आवास पहुंचते तब तक भाजपा में इस इस्तीफे का भूचाल आ चुका था।

अवसरवादी लेकिन असरदार नेता हैं नरेंद्र मोदी

किसी की समझ में नहीं आ रहा कि भाजपा की राजनीति में कभी मोदी के सबसे बड़े पैरोकार रहे आडवाणी ने उन्हीं मोदी की ताजपोशी के विरोध में इस्तीफे का अंतिम हथियार क्यों इस्तेमाल कर लिया।
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इस जंग में भले ही मोदी जीतें या आडवाणी, मगर पार्टी नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की लड़ाई में भाजपा तो अभी से हार गई है।

आडवाणी का आठ साल में तीसरी बार इस्तीफा

सवाल है कि आखिर आडवाणी और मोदी के मधुर रिश्ते में दरार इस हद तक कैसे बढ़ गई? अब आडवाणी को मोदी फूटी आंखों क्यों नहीं सुहाते? आडवाणी के करीबियों की मानें तो रिश्ते को बिगाड़ने की शुरुआत मोदी की ओर से हुई।

एक तरफ आडवाणी, मोदी को गुजरात में मजबूत करने की मुहिम में ईमानदारी से जुटे रहे। मगर मोदी अपना कद मजबूत होने के बाद आडवाणी से लगातार किनारा करते गए।

विवादों के रथ पर सवार लालकृष्ण

जिन्ना विवाद प्रकरण में भी जब संघ और उसके प्रति समर्पित भाजपा नेताओं ने आडवाणी पर पहली बार खुला हमला बोला तब भी मोदी उनके बचाव में नहीं आए। जबकि उस वक्त तो मोदी संघ की आंखों के नूर बन चुके थे।

जून 2005 में कराची स्थित जिन्ना की मजार पर पुस्तिका में अपनी बात लिखने के बाद जब तक होटल पहुंचते तब तक दिल्ली से लेकर नागपुर तक उन पर भाजपा और संघ के तीरों की बौछार शुरू हो गई थी।

इस्तीफे से दोराहे पर पार्टी
आडवाणी के इस्तीफे ने पार्टी को दोराहे पर ला खड़ा किया है। मोदी को भाजपा का नया चेहरा बना अटल-आडवाणी युग से बाहर आ चुकी पार्टी अब अपने फैसले से पीछे नहीं हट सकती।

मोदी को पीछे करने का फैसला पूरी पार्टी की फजीहत का कारण बनेगा तो आडवाणी पीछे हट कर अपनी फजीहत कराएंगे।

विवाद से निकलने का एक रास्ता मोदी का आडवाणी के समक्ष आत्मसमर्पण है। मगर जो मोदी की राजनीति और स्वभाव जानते हैं, उन्हें पता है कि इसकी संभावना बेहद कम है।
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