मस्जिद-ए-हरम में जोहर के वक्त का नजारा देख यकीन नहीं हो रहा था कि यहां बीस घंटे पहले कोई भीषण हादसा हुआ था। हरम शरीफ आजमीनों से भरा था। न तो किसी के चेहरे के पर डर था और न ही कोई सिकन।
दिल में सिर्फ खाना-ए-काबा की जियारत थी तो जुबां पर खुदा की इबादत। हादसे को भुलाकर हजयात्रियों ने मस्जिद-ए-हरम में पाबंदी के साथ पांचों वक्त नमाज अदा की।
मैं अपने साथी अजीमुद्दीन के साथ शुक्रवार की रात एक बजे (मक्का के स्थानीय वक्त के अनुसार) हरम शरीफ में पहुंचा। घटना स्थल पर मरम्मत का काम चल रहा था।
हादसे को देखते हुए लगा कि एक दो दिन बाद ही अब यहां नमाज अदा करनी मुमकिन हो पाएगी। फज्र की नमाज की अजान हुई तो दिल नहीं माना। मस्जिद-ए-हरम पहुंच तो सुखद आश्चर्य हुआ।