पास के एक मैदान में एक मासूम बच्ची बिलख रही थी। उसे नहीं पता था कि वह कहां से आ गई और उसके मां-बाप कहां चले गए। आरती ने उसे गोद में लिया और अपना बना लिया। इस बच्ची का नाम करुणा है जो अब नौ साल की हो चुकी है। करुणा देख नहीं सकती।
आरती का परिवार और बड़ा हो गया। तीन उसकी खुद की और चार ऐसी हैं जिन्हें उनके मां-बाप छोड़कर चले गए। 14 साल की सुचित्रा और 15 साल की सुमित्रा भी हैं, जो उन्हें रेलवे प्लेटफार्म पर मिलीं। इनमें सुचित्रा न बोल सकती है और न ही सुन सकती है।
इस परिवार को दो साल पहले एक और बच्ची सूफिया मिली जो न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। उन्होंने सुचित्रा और सूफिया का दाखिला सरकारी मूक बधिर स्कूल में करा दिया है।