वाकई खेती के बल पर चल रही है यूपी की सरकार। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सर्विस सेक्टर के बाद आय का सबसे बड़ा श्रोत खेती ही है। ढाई करोड़ किसान धरती का सीना चीरकर जो फसलें उगाते हैं, उससे साल भर में छह लाख करोड़ सालाना की इनकम होती है।
लेकिन खेत और किसानों पर होने वाला खर्च कुल आमदनी का बीस फीसदी भी नहीं है। यह हालात तो तब हैं जब विधानसभा से लेकर संसद तक में सूबे का प्रतिनिधित्व करने वाले माननीय कहीं-न-कहीं खेती से जुड़े हैं।
पूरे देश की अगर बात करें तो वर्ष 1951 से 2013 तक खेती पर जो खर्च हुआ है, वह एक लाख 96 हजार करोड़ रुपये हैं। जबकि आमदनी सर्विस सेक्टर और इंडस्ट्री सेक्टर से भी अधिक है। लेकिन फिर भी खेत से लेकर किसान तक के साथ बड़ा छल हो रहा है।
आरटीआई का खुलासा
योजनाएं चाहें केंद्र सरकार ने बनाई हों या फिर प्रदेश की सरकार ने। अधिकांश कागजों में ही रह गईं हैं। प्रगतिशील किसान और आरटीआई एक्टिविस्ट शिवराज सिंह को उपलब्ध हुईं सूचनाओं के मुताबिक गन्ना, गेहूं, धान, मैंथा और सब्जियों का उत्पादन सर्वाधिक हो रहा है।
लेकिन सरकार ने जो खेती के मद में बजट आरक्षित किया था उसे दूसरी योजनाओं पर खर्च कर दिया गया है। बंजर सुधार के लिए आए बजट से सड़कें बनवा दीं। ऊसर सुधार का पैसा कई जनपदों में आवासीय योजना में खर्च कर दिया गया।
उत्तर प्रदेश में आमदनी के श्रोत
सर्विस सेक्टर से आमदनी-- दो लाख 98 हजार करोड़
खेती से सालाना आमदनी-- एक लाख 81 हजार करोड़
इंडस्ट्री सेक्टर से आय----- एक लाख 28 हजार करोड़
खेती को लेकर संसद में नहीं मचा हल्ला
कॉमन वेल्थ गेम्स, जनलोकपाल, आरक्षण, टूजी स्पेक्ट्रम, तेलंगाना, कोल ब्लाक आवंटन समेत कई मामलों पर संसद में जबरदस्त हंगामा हुआ। कुर्सियां तक फेंकी गईं। फाइलें छीन ली गईं। मिर्च पाउडर उड़ाया गया। स्प्रे करके सांसदों को बेहोश कर दिया गया।
मगर आपने कभी खेती के मुद्दे पर अपने सांसदों को आवाज उठाते हुए सुना है। कभी नहीं हुआ ऐसा। संसद ही क्या विधानसभा में भी एक दो बार ही खेती गूंजी होगी।
यह स्थिति तो तब है जब अधिकांश सांसद और विधायक खेती से जुड़े हुए हैं।