राष्ट्रीय राजमार्ग जीटी रोड पर फर्राटे से ट्रक और दूसरे वाहन दौड़ रहे हैं। लेकिन इस शानदार छह लेन हाईवे से थोड़ा नीचे उतरते ही उस बिहार से साक्षात्कार होता है, जिसे माओवादियों की लाल पट्टी का हिस्सा माना जाता है।
दूर दूर तक फैली पहाडिय़ां और जंगल, उनके बीच की घाटियों में फैले खेत और बसे गांव, जिनमें हर जाति और समुदाय के लोग रहते हैं।
इनके लिए नक्सली कोई अजूबा या आतंक नहीं हैं, बल्कि इनके लिए एक दूसरा सत्ता केंद्र हैं। गांव वाले पुलिस प्रशासन और नक्सलियों के दोहरे सत्ता केंद्र के बीच फंसे हैं।
चुनाव बहिष्कार का फरमान भी, उम्मीदवारों की मदद भी
यूं तो नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार का फरमान जारी कर रखा है और उनकी मुठभेड़ भी सुरक्षा बलों से लगातार हो रही है। लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो बहिष्कार के फरमान के बावजूद नक्सली अपने हिसाब से अलग-अलग क्षेत्र में अपनी मनमाफिक पार्टी के उम्मीदवार की मदद भी कर रहे हैं।
कई उम्मीदवार भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए नक्सलियों के दरबार में दस्तक दे रहे हैं, ऐसी चर्चाएं भी सुनने को मिल रही हैं।
सड़क के किनारे एक दुकान पर बैठे सलीम और शौकत कहते हैं कि यहां वही जीतेगी जिसे पहाड़ वाली पार्टी का समर्थन होगा। पहाड़ वाली पार्टी का मतलब नक्सलियों से है।
गांव में नक्सलियों ने अपने तरीके से संदेश भेजने शुरु किए
यह पूछने पर कि नक्सली तो चुनाव बहिष्कार के लिए कह रहे हैं, लोग कहते हैं कि वह फरमान तो सिर्फ सुरक्षा बलों को न आने देने के लिए है। गांव गांव नक्सलियों ने अपने तरीके से संदेश भेजने शुरु कर दिए हैं कि किसे जिताना है।
यह बात गया, जमुई, जहानाबाद, औरंगाबाद, सासाराम आदि उन सभी लोकसभा क्षेत्रों में सुनने को मिलती हैं, जहां नक्सलियों का असर है।
जमुई से जद (यू) के उम्मीदवार और विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी पर तो नक्सलियों से साठगांठ के आरोपों की सफाई तो खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी जनसभाओं में देनी पड़ी।
बिहार के विकास और सुशासन का दावा भी यहां नदारद
जबकि औरंगाबाद के गरुआ, गरारू, बैजू बिगहा, इमामगंज, मथुरापुर घूमते हुए कई जगह पहाड़ों पर से नक्सली हमारी निगरानी करते हुए भी दिखाई दिए। यह भी पता चला कि एक प्रमुख उम्मीदवार गरुआ के पहाड़ों के पीछे कुछ नक्सली नेताओं से समर्थन मांगने भी गए थे।
औरंगाबाद और गया जिलों के नक्सल बहुल इलाके में घूमते हुए बिहार के विकास और सुशासन से भी साक्षात्कार होता है। सड़कें ऐसी कि ट्रैक्टर और बैलगाड़ी भी चलने से इनकार कर दें।
हाईवे पर खड़े लोग कहते हैं कि जीटी रोड और राज्य राजमार्ग को देखकर बिहार के विकास का अंदाज मत लगाईए। जरा नीचे उतरकर पहाड़ों की तरफ जाकर हकीकत देखिए।
गांव वालों ने भी लगा रखा है मतदान बहिष्कार का बैनर
हम हाईवे से उतरकर पहाड़ों की तरफ चलते हैं। बेहद गड्ढेदार रास्ता और आगे बलिया गांव। जहां सड़क न होने के विरोध में मतदान बहिष्कार का बैनर लगा मिलता है।
गांव वाले बेहद गुस्से में हैं, लेकिन अपना नाम बताने से परहेज करते हैं। कहते हैं कि नाम बता देंगे तो पुलिस झूठा मुकदमा दर्ज कर देगी।
हर बिरादरी के लोग इस बात से खफा हैं कि उनके गांव तक पहुंचने का रास्ता बेहद खस्ताहाल है और बार बार वादे के बावजूद सड़क नहीं बनी। मौजूदा सांसद चुनाव जीतने केबाद कभी लौटकर नहीं आए। दूसरों ने भी कोई खोज खबर नहीं ली। लिहाजा वोट न डालने का सामूहिक फैसला लिया गया है।
पैदल लायक भी नहीं है लाल पट्टी के इलाकों में रास्ता
गांव से आगे चलते हैं तो दूसरे गांव तक पहुंचने में डाईवर से लेकर हम सबको पसीना आ जाता है। इसके बाद तो हमारी कार भी आगे बढऩे से इनकार कर देती है। पैदल चल देते हैं।
लेकिन रास्ता पैदल लायक भी नहीं है। खेतों में काम करते लोगों से बात करने पर पता चलता है कि सड़क बनने का ठेका उठता है लेकिन नक्सली काम नहीं होने देते। उन्हें लगता है कि सड़कें बनने से पुलिस और सुरक्षा बलों का आवागमन आसान हो जाएगा।
उनकी इस रणनीति का खामियाजा गांव वालों को भुगतना पड़ रहा है। इशारे से एक गांव वाला एक पहाड़ की चोटी पर बैठे कुछ युवकों को दिखाते हुए बताता है कि वह देखिए आप लोगों की भी निगरानी हो रही है। वक्त रहते निकल जाईए। इसके बाद हम भी लौट पड़ते हैं।