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छह महीने में पीएम को भी नहीं दिया सरकार ने जवाब

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सरकारी दफ्तरों से जानकारी पाना आम आदमी के लिए टेढ़ी खीर है। बीसियों चक्कर लगाइए और महीनों इंतजार करिए, किस्मत अच्छी रही तो जवाब पा जांएगे, अन्यथा आपकी अगली पीढ़ी दफ्तरों का चक्कर लगाएगी।
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कल्पना करें कि कुछ ऐसी हालत देश के प्रधानमंत्री की हो जाए। उन्हें भी महज एक जानकारी पाने के लिए इंतजार करना पड़े। और इंतजार भी एक दो दिन या सप्ताह भर नहीं, बल्कि 6 महीने 13 दिन का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा ही एक वाकया पेश आया है।

दरअसल प्रधानमंत्री ने 11 अगस्त, 2014 को लोकसभा में कानून एवं न्याय मंत्रालय से एक सवाल पूछा था, लेकिन उन्हें 6 महीने 13 दिन बाद भी जवाब नहीं मिल पाया।
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मोदी ने कानून मंत्रालय से मांगी थी जानकारी

लोकसभा की वेबसाइट के मुताबिक, छह हिस्सों के अतरांकित प्रश्न प्रधानमंत्री ने कानून मंत्रालय से दस्‍तावेज में अभिभावक का नाम शामिल करने की अनिवार्यता को लेकर सवाल पूछा था।

कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद ने उस समय प्रोटोकॉल के मुताबिक कहा था प्रश्न के संबंध में जानकारी इकट्ठा होने के बाद सदन में जवाब रख दिया जाएगा। रविशंकर प्रसाद के पास उस समय सूचना और प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था।

हालांकि प्रसाद के अश्वासन के बाद मंत्रालय ने सवाल को भूला ही दिया और 6 महीने बाद भी जवाब नहीं दे सका। संसद के नियमों के अनुसार अतारांकित प्रश्न का उत्तर सदन में मौखिक रूप से नहीं दिया जाता, ब‌ल्‍कि प्रश्नकाल के बाद मंत्री सदन में प्रश्न का ‌लिखित उत्तर रख देता है।

टीएमसी के सासंद ने भी पूछा वही सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सवाल पूछा था, वही सवाल तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौमित्र खान ने भी पूछा था। हालांकि दोनों को ही अब तक जवाब नहीं मिल पाया।

मंत्रालय की लापरवाही पर सूचना के अधिकार के लिए काम करने वाले राकेश दुब्बूदू ने कहा कि जिस देश में प्रधानमंत्री के सवाल का जवाब नहीं दिया जा रहा है, आप सोच सकते हैं कि उस देश में आम आदमी का क्या हाल होगा?

कानून मंत्रालय के अधिकारियों से भी जब पूछा गया ‌तो उन्होंने भी माना कि प्रधानमंत्री के सवाल का जवाब अब तक दिया नहीं जा सका है।

जवाब में देरी को ठीकरा कमेटी ऑफ गवर्नेंस एस्यूरेंस (CGA) पर फोड़ते हुए उन्होंने कहा कि हर सवाल के जवाब कि एक प्रक्रिया होता है। जब किसी प्रश्न पर मंत्री सहमति देदेता है तो उसे कमेटी ऑॅफ गवर्नेंस एस्यूरेंस को सौंप दिया जाता है। फिलहाल मामला उन्हीं के पास है और उन्हें ही जवाब देना है।
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मनमोहन ने 10 साल में एक भी सवाल नहीं पूछा

वहीं CGA के एक अतिरिक्त निदेशक ने नाम न ‌जाहिर करने की शर्त पर बताया कि एक उत्तर देने के लिए तीन महीने का समय निर्धारित होता है। ये समय खत्म हो गया, जिसके बाद मंत्रालय तीन महीने का अतिरिक्त समय मांगा है। हालांकि उन्हें अब तक समय दिया नहीं गया है।

प्रकिया के अनुसार किसी सवाल के संदर्भ में जानकारियां जब जुटा ली जाती हैं, तब उसे संसदीयकार्य मंत्रालय को भेज दिया जाता है और वहीं उसे सदन में रखता है।

दुब्बूदू ने बताया‌ कि ऐसा बहुत ही कम होता है कि नेता सदन कोई सवाल पूछे। मनमोहन सिंह 2004 से 2014 तक, 10 साल नेता सदन रहे लेकिन उन्होंने एक सवाल भी नहीं पूछा था।
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