कहते है मेहनत और लगन के बलबूते हर चीज आसान हो जाती है। महज 9 साल का एक बच्चा गोल्फ मैदान में प्रवेश करता है, सिर्फ इस इरादे से कि वो बॉल-ब्वॉय बनकर अपने घर के लिए कुछ पैसे कमा लेगा। मगर कमाई का यह बहाना उस गरीब बच्चे को उस खेल के प्रति आकर्षित करता है, जिसे अमीरों का खेल माना जाता है।
लेकिन शायद लगन अमीरी-गरीबी को नहीं समझती। उसे उस खेल से मोहब्बत हो जाती है। एक ऐसी मोहब्बत जो जुनून में बदलकर उसे उस खेल का उम्दा खिलाड़ी बनने के लिए प्रेरित करने लगती है। आज एक खेतिहर मजदूर का बेटा चिक्का गोल्फ का उम्दा खिलाड़ी बन चुका है। चिक्का के एक बॉल-ब्वॉय से गोल्फ सनसनी बनने की कहानी काफी रोचक है।
एक गरीब परिवार से ताल्लुख रखने वाला एक लड़का सेनप्पा चिक्कारंगप्पा बॉल-ब्वाय बनने के लिए गोल्फ के मैदान में प्रवेश करता है, लेकिन उसे उस गोल्फ से प्यार कर बैठता है जिसे वो अपनी आमदनी का जरिया बनाने आया था। वो आज एक ऐसा खिलाड़ी बन चुका है जो इंडियन गोल्फ यूनियन की ऑर्डर ऑफ मेरिट में दूसरे नंबर पर काबिज है।
कुछ लोगों के लिए यह एक सपने में बनी कहानी हो सकती है लेकिन सेनप्पा चिक्कारंगप्पा ने इसे अपनी रियल लाइफ में सच साबित करके दिखाया है। 19 साल का चिक्का उन युवा खिलाड़ियों में से एक है जो साल 2009 के आल इंडिया- एम्च्योर चैंपियनशिप को जीत चुका है और एकलौता खिलाड़ी है जो आल इंडिया एम्च्योर और जूनियर चैंपियनशिप को भी जीत चुका है। लेकिन अभी चिक्का को और लंबा सफर तय करना है। लेकिन चिक्का का सफर उन तमाम दिलचस्प कहानियों से भरा पड़ा है जिसने उसे बड़ा गोल्फ खिलाड़ी बनने के लिए प्रेरित किया।
घर के पास के गोल्फ मैदान ने बदली चिक्का की जिंदगी
चिक्का ने बताया कि मैं देखता था कि लोग एक ऐसे खेल को खेलने आते थे जिसे मैने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं देखा था। उसने बताया कि वो पहले सोचता था कि यह हॉकी जैसा ही कोई खेल होगा। लेकिन इस खेल ने मुझे आकर्षित किया। चिक्का ने बताया कि उसके कुछ दोस्त वीकेंड पर कमाई करने के लिए बतौर बॉल-ब्वॉय वहां जाया करते थे। इसलिए मैं भी वहां जाने लगा। उसने बताया कि वो तब उन खिलाड़ियों को देखकर उस खेल को सीखने के बारे में सोचता रहता था। चिक्का उस खेल को बड़ी ही गंभीरता के साथ देखा करता था और फिर उसे अपने गांव के खेत में खेलने की कोशिश करता था।
चिक्का ने चुराई थीं कुछ गेंदे
चिक्का ने बताया कि अगर वो सच कहे तो उसने गोल्फ की कुछ गेंदे चुराई थीं। उसने बताया कि मैं सोचता था कि लकड़ी की छड़ से इसके साथ प्रैक्टिस करूंगा। उसने बताया कि उसे एक बार खेलते हुए एक गोल्फ कोच ने देख लिया और उसे अपने ऑफिस बुलाया। चिक्का ने कहा कि वो उस वक्त काफी डरा हुआ सा था। उसने बताया कि वो खेलने के प्रस्ताव मिलने के बजाय डांट पड़ने की वजह से डर रहा था।
फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है चिक्का
चिक्का के कोच ने बताया कि जिस वक्त उसने चिक्का को खेलने का प्रस्ताव दिया था वो उस वक्त अंग्रेजी भाषा को जरा भी नहीं समझता था। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने चिक्का को इस खेल को खेलने की सलाद ही तो उस वक्त उसने जो कहा उन्हें समझ नहीं आया। तब उसकी बात को किसी ने ट्रांसलेट करके मुझे बताया था, तब मैने उस पर प्रतिक्रिया देते हुए वॉव कहा था, लेकिन आज चिक्का फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है।
चिक्का की प्रतिभा पर उनको कोच को पूरा भरोसा
चिक्का को कोच विजय दिवेचा यह बात अच्छे से जानते हैं कि गोल्फ एक महंगा खेल है, लेकिन वो चिक्का की प्रतिभा पर हद से ज्यादा भरोसा करते हैं। शायद यही वजह रही कि वो ईगलटन गोल्फ रिसोर्ट में इस युवा गोल्फ खिलाड़ी को खेलने की अनुमति दिलाने में कामयाब रहे।
मां बाप को मुश्किल से समझाया
शुरूआती 6-8 महीने चिक्का के लिए ठीक रहे। सब कुछ चिक्का के मुताबिक ही हो रहा था। लेकिन चिक्का के सामन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इस खेल के लिए वो अपने मां बाप को कैसे समझाए। उसने बताया कि उसके माता-पिता इस खेल को लेकर कतई राजी नहीं थे, उन्होंने तो लगभग न ही कर दी थी। चिक्का ने बताया कि वो अपने मा बाप का अकेला लड़का है और उसकी दो बहने हैं। चिक्का ने बताया कि उसके पिता खेल खेलने के बजाए पढ़ाई लिखाई करने के लिए कहा करते थे। लेकिन लाख समझाने के बावजूद भी जब वो नहीं माने तो चिक्का ने भूंख हड़ताल कर दी। इस भूख हड़ताल की वजह से ही चिक्का के माता-पिता किसी तरह से राजी हुए। लेकिन साथ ही उन्होंने एक शर्त रख दी थी कि अगर साल भर के भीतर कुछ नहीं हुआ तो उसे खेल छोड़ना होगा।
लेकिन चिक्का ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन और भारत में उसको चाहने वालो की बढ़ती तादात के जरिए अपने पिता को आश्चर्य चकित कर दिया। चिक्का ने अपनी पहली ही प्रतिस्पर्धा में नंबर दो का स्थान हासिल किया और अगले टूर्नामेंट में उसने नंबर एक खिलाड़ी खलिन जोशी को हराया। उसने बताया कि अगले ही दिन उसकी तस्वीरें अखबारों में थीं।
प्रोफेशनल गोल्फर बनना चाहता है चिक्का
चिक्का के बेहतर करियर की शुरूआत हो चुकी है और वो अब इस साल के अंत तक प्रोफेशनल खिलाड़ी बनना चाहता है और वर्ल्ड एम्च्योर टीम चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहता है।
सिर्फ देख देख कर ही गोल्फ सीखने वाले चिक्का से जब पूछा गया कि क्या उनके लिए गोल्फ सीखना आसान था, तो इसके जवाब में चिक्का ने कहा बिल्कुल नहीं। उसने बताया कि कुछ भी सीखने से पहले आपको मानसिक तौर पर मजबूत होना होता है। मैं कह नहीं सकता है मैं इस खेल की प्रतिभा लिए हुए इस दुनिया में पैदा हुआ, लेकिन यह कुछ ऐसा था जैसे ये मेरे ही लिए हो।
गोल्फ मैदान की हरियाली में गेंद को इधर से उधर जाते हुए देखना और लकड़ी की छड़ के सहारे इस खेल की प्रैक्टिस करना ताकि वो एक बॉल-ब्वॉय बन सके। चिक्का अब इस खेल का उम्दा खिलाड़ी बनने के बाद इस खेल के आकर्षण का प्रतीक बन चुका है।
चिक्का आज भी जटिल तकनीकों के बजाए अपनी साधारण तकनीकों पर भरोसा करता है। वो बताता है कि क्रिकेट में क्रिकेट की बॉल को हिट करना गेंदबाज की लय और रफ्तार पर निर्भर करता है लेकिन गोल्फ में सबकुछ एक ही खिलाड़ी पर निर्भर करता है कि वो इसे किस तरह से हिट करता है।