बंटवारे के कारण सुनील दत्त के परिवार को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। यहां से संघर्ष का एक नया सफर शुरू हुआ
जो उन्हें मुंबई तक ले आया।
उनके दिन में न जाने क्या क्या अरमान थे, लेकिन जिंदगी की जद्दोजहद और जीवन यापन के लिए मुंबई के बेस्ट में भी एक छोटी नौकरी करनी पड़ी। लेकिन उनकी मंजिल कहीं और थी।
जल्दी ही वह रेडियो की दुनिया में उनकी पहचान हो गई।फिल्मों का उन्हें शौक था, वह अपने कार्यक्रम में फिल्मी कलाकारों का इंटरव्यू लिया करते थे। यह कार्यक्रम लोकप्रिय था।
सुनील दत्त ने नर्गिस पहली बार दो बीघा जमीन के सेट पर देखा था। नर्गिस उस दौर की सफलतम अभिनेत्री थी। उन्हें दूर से निहारना वाला सुनील दत्त एक छात्र।
सिल्वर स्क्रीन की ये महान अभिनेत्री को आगे चलकर इस छात्र की जीवन संगिनी बनना था। फिल्म के उस सेट पर नर्गिस को क्या देखा,सुनील दत्त तो उनके फैन ही हो गए।
नर्गिस तब मेरीन मरीन ड्राइव में रहा करती थीं। वह अक्सर सफेद रंग की कार में आया जाया करती थीं। सुनील दत्त उकी गाड़ी का इंतजार करते थे। अक्सर वह कार आती और ओझल हो जाती।
सुनील दत्त जब रेडियों सीलोन में उद्घोषक बने तो उन्हें फिल्म कलाकारों का इंटरव्यू करने का अवसर मिला। तब वह सोचते थे कि क्या वह अपनी पसंद की इस कलाकार का इंटरव्यू कर सकेंगे।
नर्गिस महान अदाकारा थीं लेकिन वह इंटरव्यू या मिलने जुलने में रुचि नहीं दिखाती थीं। पत्रकारों या रेडियो के उद्घोषकों के लिए उनका इंटरव्यू ले पाना मुश्किल होता था।
किसी तरह सुनील दत्त ने सिफारिश के जरिए नर्गिस को इंटरव्यू के लिए तैयार किया। यहां तक तो ठीक लेकिन दिक्कत आगे थी। सुनील दत्त को अब तक इंटरव्यू लेने में किसी तरह की झिझक नहीं हुई।
वह अपना काम शानदार तरीके से कर रहे थे। लेकिन नर्गिस के सामने होने पर वह नर्वस हो गए। बस किसी तरह उन्होंने वह इंटरव्यू लिया। इंटरव्यू के बाद उन्होंने झिझकते हुए नर्गिस से पूछा, क्या उन्होंने अच्छा इंटरव्यू लिया है।
नर्गिस ने जवाब हां में दिया। जब यह इंटरव्यू रेडियो पर आया तो वह बहुत खुश हो गए। उन्होंने अपने कई दोस्तों के साथ इस बात को शेयर किया कि उन्होंने नर्गिसजी से बातें की है।
आगे वह भी फिल्में करने लगे।1957 में वह समय भी आया जब उन्हें मदर इंडिया में अपनी फेवरेट हीरोइन नर्गिस के साथ काम करने का मौका मिला। यह फिल्म कई कारणों से फिल्म संसार में अविस्मरणीय कही जाती है। नर्गिस,सुनील दत्त राजकुमार का अभिनय, नौशाद का संगीत। लताजी की आवाज।
और यही फिल्म थी जहां एक घटना के चलते सुनील और नर्गिस दोनों एक दूसरे के करीब आए। सुनील दत्त ने फिल्म की शूटिंग के दौरान आग लगने से नर्गिस को बचाया था।
मदर इंडिया का ही दौर था जब सुनील दत्त की बहन गंभीर रूप से बीमार पड़ी थीं। उस समय नर्गिस उसे अस्पताल ले गई व उसका इलाज करवाया।
इन स्थितियों में सुनील दत्त ने महसूस किया कि नर्गिस उनकी जीवन संगिनी बन सकती है। कहा जाता है कि एक दिन कार में सफर करते हुए जब नर्गिस घर जाने के लिए उतरने लगी तो सुनील दत्त ने उन्हें एक बंद लिफाफा दिया, और कहा कि इसे घर पर खोलकर पढ़िएगा।
बस हां या ना कहना। नर्गिस को छोड़ने के बाद जब सुनील दत्त घर पहुंचे तो उनकी बहन ने उनके आते ही कहा कि नर्गिसजी ने कहा कि सुनील जी से कहिएगा हां। और एक साल बाद विवाह बंधन में भी बंध गए।
जिस वक्त हमने शादी का फैसला किया उस वक्त लोगों ने कहा कि ये शादी ज्यादा नहीं चलेगी। मगर दोनों ने अपने
रिश्ते को बखूबी निभाया। बहुत प्यार से निभाया। नर्गिस सुनील दत्त को डार्लिंगजी कहकर पुकारा करती थी।