महबूबा महबूबा के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। शुरू-शुरू में इस गीत को गाने के लिए किशोर की आवाज तय हुई थी, पर किस तरह से यह गीत पंचम की झोली में आ गया, यह एक दिलचस्प वाकया है।
हुआ यूं कि एक बार राहुल देव बर्मन के मामा श्री निर्मल कुमार दासगुप्ता अपनी बहन यानी राहुल देव बर्मन की मां मीरा देव बर्मन से मिलने मुम्बई आए हुए थे। पंचम और उनके मामा के बीच में बहुत प्यार था। पंचम अपने मामाजी को मोनी दादू कह कर बुलाते थे तो मामाजी अपने भांजे को टुबलू बुलाया करते।
निर्मल मार्च 1975 को बम्बई अपनी बहन मीरा जी से मिलने आए। उन दिनों 'शोले' के गीतों की रेकॉर्डिंग चल रही थी। तो एक दिन शाम को 'शोले' के संगीतकार पंचम एक गीत का स्क्रैच रेकॉर्ड करके घर पहुंचे और उस स्क्रैच को अपने मामाजी को सुनवाने के लिए व्याकुल थे। मां से पता चला कि मामाजी छत पर चाय पी रहे हैं। पंचम सारा ताम-झाम लेकर छत पर ही...
इसे किशोर कुमार से गवाने की क्या जरूरत है?
पंचम सारा ताम-झाम लेकर छत पर ही पहुंच गए और अपने मोनी दादू को वह स्क्रैच सुनवाया। वह स्क्रैच था "महबूबा महबूबा" गाने का। स्क्रैच उस जमाने में कोई भी डबिंग आर्टिस्ट या संगीतकार ही गा दिया करता था, मुख्य गायक-गायिका को इसके लिए नहीं बुलाते थे।
इसलिए किशोर कुमार की आवाज में रेकॉर्ड होने वाले इस गीत का स्क्रैच पंचम खुद अपनी आवाज में रेकॉर्ड कर लाए थे। पंचम के मामाजी ने जैसे ही यह स्क्रैच सुना तो तुरन्त अपने भांजे से कहा कि अरे, यह तो तुम्हारी आवाज में भी बहुत अच्छा लग रहा है, इसे किशोर कुमार से गवाने की क्या जरूरत है?
पंचम ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया था, वो तो अपने मामाजी को सिर्फ गीत की कम्पोजिशन सुनवाना चाहते थे। इसलिए वो हंस पड़े और मामाजी की बात को टाल दिया। बात वहीं पर खत्म हो गई। फिर कुछ दिनों बाद गीत की फाइनल रेकॉर्डिंग की बारी आई। पर किशोर कुमार किसी वजह से स्टुडियो नहीं पहुंच सके। सारा इन्तजाम हो चुका था, म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रेकॉर्डिंग रद्द करने का...
बाद में जब किशोर कुमार ने यह गीत सुना तो...
सारा इन्तजाम हो चुका था, म्युज़िशियन्स आ चुके थे, रेकॉर्डिंग रद्द करने का मतलब माली नुकसान था। उस दिन भी किशोर कुमार का इन्तजार करते हुए पंचम साजिन्दों को लेकर यह गीत खुद ही गा गए। उनकी आवाज में इस गीत को सुनते ही रमेश सिप्पी उछल पड़े। कहने लगे कि अब यह गीत आप ही गाओगे!
यह फिल्म के किसी नायक पर नहीं फिल्माया जा रहा, इसलिए जरूरी नहीं कि इसे किशोर से गवाया जाए क्योंकि यह जलाल आगा पर फिल्माया जाना है और आपकी आवाज में बड़ा ही असरदार लग रहा है, इसलिए इसे अब आप ही गाओगे। अपने मामाजी की बात भी पंचम को याद आ गई, और सबकी सहमति पर पंचम ने अपनी ही आवाज में यह गीत रेकॉर्ड करवाया।
बाद में जब किशोर कुमार ने यह गीत सुना तो उन्होंने भी यह स्वीकार किया कि इस तरह से तो वो भी नहीं गा पाते इस गीत को, और उनका उस दिन रेकॉर्डिंग पर ना पहुंचना ही इस गीत के लिए बेहतर सिद्ध हुआ।
चुराई थी "महबूबा महबूबा" की धुन
"महबूबा महबूबा" की धुन पंचम की रचना नहीं है। यह धुन प्रेरित है ग्रीक गायक डेमिस रुसोस के गीत "say you love me" की धुन से। यह गीत जारी हुआ था साल 1974 में, यानी कि 'शोले' के ठीक एक साल पहले। पर मज़े की बात तो यह है कि डेमिस रुसोस की भी यह मूल रचना नहीं है।
रुसोस भी प्रेरित हुए थे एक अन्य गीत से। वह गीत था ग्रीक गायक मिकैलिस विओलरिस का गाया "ta rialia" जो बना था साल 1973 में। इस तरह से 1973 में "ta rialia", 1974 में "say you love me" और 1975 में "महबूबा महबूबा" एक ही धुन पर बना और तीनों ही गाने बेहद कामयाब रहे।
संतूर बजाया था संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा ने
राहुल देव बर्मन और संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा के बीच गहरी दोस्ती थी। पंडित जी ने पंचम के कई गीतों में संतूर बजाए हैं, और 'शोले' का यह गीत भी उन्हीं में से एक है। पर इस गीत में वाद्य भारतीय संतूर नहीं बल्कि इरानी संतूर था। इस बारे में पंडित जी ने अपने एक कार्यक्रम में जब महबूबा गाने का जिक्र आया तो उन्होंने बताया, पंचम बहुत जिद्दत की बात सोचते रहते थे।
कुछ ऐसी बात कि इस बात में से नया क्या निकाले। तो फ़िल्म बन रही थी 'शोले'। उसमें वो म्युज़िक दे रहे थे। और एक, जैसा मैंने कहा, जिद्दत कुछ न कुछ करते रहते थे, तो अपने गाने में भी कुछ आवाज ऐसी बनाते थे कि अलग अंदाज का एक गाना, एक अलग स्टाइल क्रिएट किया। "महबूबा महबूबा" में उन्होंने ईरानी संतूर इस्तेमाल किया। ईरानी संतूर हमारे संतूर से टोनल क्वालिटी में अलग है, शेप भी अलग है, सिस्टम वही है, और यह मेरे पास कैसे आया कि 1969 में मैं ईरान गया था 'शिराज फ़ेस्टिवल' में बजाने के लिए। इन्टरनेशनल फ़ेस्टिवल हुआ था वहां।
वहां की सरकार ने मुझे गिफ़्ट में ईरानी संतूर दिया था। तो पंचम ने क्या किया कि इरानी संतूर को, अब सोचिए कि यह ईलेक्ट्रॉनिक म्युज़िक तो आज हुआ है, 'शोले' कभी की आई थी, राजकमल स्टुडियो में उन्होंने अपनी तरह से एक एक्स्पेरीमेंट करके उसकी टोन में कुछ बदलाव किया और एक अलग अंदाज की टोन बनाई, जो उस गाने के मूड को सूट करे। बड़ा ही प्रॉमिनेंट पीस था जो गीत में कई बार सुनने को मिलता है, मुखड़े के दो बार "महबूबा महबूबा" के बीच में यह पीस है और अन्य कई जगहों पर भी है।"