अमर उजाला ऑफिस आए फिल्म लेखक, निर्देशक और निर्माता अनुराग कश्यप ने अपने फिल्मी जीवन और फिल्मी सोच को लेकर लंबी बात की।
मेरी लिखी हुई 'सत्या', 'कौन', 'शूल' जैसी फिल्में जब बड़ी हिट हुई तो मुझे लगा कि मैं अच्छा लिखने के साथ्ा अच्छा निर्देशन भी कर सकता हूं। फिल्म 'पांच' की बुनियाद इसी सोच की वजह से पड़ी। फिल्म लिखने के बाद मैने केके मेनन को मुख्य हीरो लेकर फिल्म शुरू की। 'पांच' के निर्देशन ने मुझे एहसास कराया लिखना एक बात होती है और बतौर निर्देशक इसे शूट करना दूसरी बात।
जब आप लिख रहे होते हैँ तो उस समय फिल्म की मेकिंग में क्या समस्याएं आ सकती हैं इस पर आपका दिमाग नहीं जाता। आप पूरी तरह से स्क्रिप्ट पर फोकस रहते हो। 'पांच' बनते-बनते ठहर गई। इसकी कई वजहें रहीं। मैं आज उन वजहों की सही समीक्षा कर सकता हूं। इस फिल्म के रूकने के बाद मैं फिर से सिर्फ लिखने के काम में लग गया।
आज मुझे लगता है कि 'पांच' का बंद होना मेरी जीवन की सबसी बड़ी लर्निंग थी। यदि 'पांच' बन जाती और बनने के बाद थोड़ा बहुत चल जाती तो मैं उन्हीं फिल्मी फॉर्मूलों पर फिल्म बनाना शुरू कर देता जो उस समय के लोकप्रिय फॉर्मूले थे। मैने तो सोच भी लिया था कि पांच के बाद मैं सुनील शेट्टी को लेकर एक फिल्म बनाऊंगा। यदि 'पांच' चलती तो आप समझ सकते हैं कि मैं किस दशा में आगे बढ़ा होता।
अपनी सोच को आगे बढ़ाना होता हैः
जब आप फिल्म बना रहे होते हैं तो विषय के साथ आपका ईमानदारी से जुड़ा होना बहुत आवश्यक है। इंडस्ट्री में कई बार यह सुनने में आता है कि बाजार और लोगों को ध्यान में रखकर फिल्म बनाओ। एक फिल्म मेकर, स्क्रिप्ट राइटर भी उसी समाज का हिस्सा होता है।
यदि वह किसी घटना, विचार या सोच को लेकर खुद को संवेदनशील महसूस करता है तो जाहिर सी बात है कि समाज भी उस घटना या सोच प्रति वैसा ही रवैया रखता है। फिल्म इंडस्ट्री में एक चलन है कि हम अपने दर्शक को बहुत सामान्य दिमाग का मानते हैं।
हम यह मानते हैँ कि बहुत सतही चीजें ही उसे पसंद आएंगी। ऐसा नहीं है। दर्शक फिल्म से कुछ सीखना भी चाहता है। कुछ ऐसी बातों का विस्तार से देखना-सुनना चाहता है जिसे वह सोचता तो है पर उसके पास उसको व्यक्त करने के शब्द नहीं होते हैं।
फिल्मकार का काम दर्शक की उस छिपी हुई सोच को पर्दे पर साकार करने का होता है। सोचने वाले दर्शकों की संख्या बढ़ रही है हमें यह संख्या और तेजी से बढ़ानी है। चुनौती होती है सोच को बनाए रखना। फिल्म इंडस्ट्री में अपनी नई सोच को आगे बढ़ाने के लिए हमें दोहरा काम करना होता है।
पहला जो इंडस्ट्री में चलन चल रहा है वैसा करते रहें और साथ ही साथ कुछ ऐसा भी करते रहें ताकि इंडस्ट्री को एहसास हो कि आप इसके अलावा भी कुछ और कर सकते हैं। मैने यही किया। ब्लैक फ्राइडे और नो स्मोकिंग फिल्में मैने अपने लिए लिखीं तो इसी दौरान वाटर और पैसा वसूल खुद को सरवाईव करने के लिए। इन फिल्मों को रिस्पॉस तो कम मिला पर मेरे ऊपर इस बात की मोहर लग गई कि मैं कुछ अलग कर सकता हूं, कर रहा हूं। कुछ अलग हूं वाली सोच मेरे काम तब तब मेरे काम आती जब मैं बिल्कुल अलग-थलग हो चुका होता।
और फिर चीजें व्यवस्थित होती गई
मुझे पता था कि मैं जिस किस्म का सिनेमा बनाना चाहता हूं लोग उसे देखना पसंद करेंगे। बस मुझे थोड़ा सा संयम दिखाना होगा। 'देव डी' की सफलता ने मेरी इस सोच पर सत्यता की मोहर लगाई। 'देव डी' के बाद 'गुलाल' और 'उड़ान' भी मेरी सफल फिल्मों में रही। इसके बाद अनुराग कश्यप को खुद को प्रूव करने वाला संघर्ष खत्म हो गया था।
अब नया संघर्ष सिनेमा की इस शैली को बनाए रखने का था। 'शैतान' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्मों की सफलता मुझे इस बात का संतोष देती है कि मैं उस गुणवत्ता को बनाए रखने में सफल रहा जिसे लेकर मैं चला था।
निर्माता अलग हूं, निर्देशक अलगः
निर्माता और निर्देशक के रूप में मेरे दो अलग-अलग चेहरे हैं। एक निर्माता के रूप में मैं थोड़ा उदार हूं। मैं फिल्म की पटकथा, स्टारकॉस्ट और मेकिंग स्टाईल पर थोड़ी तफशीश करने के बाद सारा काम निर्देशक के जिम्मे छोड़ देता हूं। एक निर्माता के रूप में मैं फिल्म में वहीं दखल देता हूं जहां निर्देशक को आवश्यकता होती है।
'लव शव ते चिकन खुराना' फिल्म के सेट में मैं एक बार भी नहीं गया। एक निर्देशक के रूप में मैं थोड़ा अलग हूं। कुछ ज्यादा ही संजीदा। खुद के प्रति और दर्शकों के प्रति भी। 2013 में आने वाली फिल्म 'बांबे वेलवेट' को छोड़कर मैँ किसी फिल्म का निर्देशन नहीं कर रहा हूं। हां बतौर प्रोड्यूसर मेरी कोशिश रहेगी कि साल में मैं कम से कम सात-आठ फिल्में प्रोड्यूस करूं।