आशा भोसले के जन्मदिन पर जानिए उनके हिट गानों के पीछे की कहानी। यकीनन आज तक आपने यह कहानी नहीं सुनी होगी।
विख्यात गायिका आशा भोसले 81 वर्ष की हो गई हैं। आशा भोसले की आवाज ने फिल्म संगीत को सदाबहार गीत दिए। उनकी गायकी में शोख, चुलबुलापन और मार्धुय है। फिल्म गायकी की हर विधा पर उनके यादगार नग्में संगीत के रसिकों को मंत्रमुग्ध करते रहे।
ओ पी नैय्यर और फिर आर डी बर्मन जैसे संगीतकारों के साथ आशा के गीतों का सौंदर्य भारतीय फिल्म संगीत की धरोहर बन गया। कई बेमिसाल तराने हैं, छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा, इशारों इशारों में दिल लेने वाले, ओ मेरी सोना रे सोना, ओ हसीना जुल्फों वाली, कोई लहरी बाबु दिल शहरी बाबु, दम मारो दम, जैसे मिजाज वाले गीत दिए।
वहीं दूसरी ओर अबके बरस भेजो भइया को बाबुल, संसार है इक नदिया जैसे विरही गीत, तो वहीं में उमराव जान की शास्त्रीयता वाले गीत। वहीं फिल्मी केबरे, मुजरों के गीतों में भी आशा की आवाज हर जगह छाई रही।
आशाजी के गीतों के पीछे कुछ कहानी ...
सदाबहार गीत ओ मेरे सोना रे सोना रे सोना रे गीत आज भी सुना जाता है तो एक ताजे हवा के झोंके की तरह महसूस होता है। लगता नहीं कि सालों पहले यह धुन बनी होगी और इसे गाया गया होगा। इस गीत के पीछे एक बेहद दिलचस्प किस्सा है।
आर. डी. बर्मन ने लंदन में एक जापानी बैले डांस देखा था। उसमें नर्तकी नाचते वक्त बीच-बीच में सोना सोना भी कहती जाती थी। वह जिस ढंग से अपने नृत्य के बीच में सोना सोना कहती थी वह अंदाज सबको भा गया। आर डी बर्मन को भी वह अंदाज बेहद पसंद आया।
उन्होंने उसी वक्त तय किया कि अपने संगीतबद्ध किसी गीत में वे इस शब्द यानी सोना शब्द का इस्तेमाल इसी तरह की पुकार के साथ और खूबसूरती से जरूर करेंगे। यह अवसर भी उन्हें जल्दी ही मिल गया।
तीसरी कसम में ओ मेरी सोना रे सोना में सोना शब्द उन्होंने इसी तरह जोड़ा। इस फिल्म में वो हसीना जुल्फों वाली, दीवाना मुझसा नहीं जैसे कई सुंदर तराने हैं। पर फिल्म का ओ मेरी सोना रे सोना तो हर जगह सुना जाने लगा। हर महफिल का गीत बन गया। रेडियो में इस गीत की बार बार फरमाइश होती रही।
उड़े जब जब जुल्फे तेरी...
ओ पी नैय्यर का फिल्म संगीत लताजी के बगैर रहा। मगर उनके संगीत ने बहुत ऊंचाइयां छुई। लता तो नहीं, मगर उनकी बहन आशा भोसले के साथ उन्होंने जिस तरह के तरानों का सृजन किया है, वो बेमिसाल हैं। आशा और ओ पी नैय्यर का यह कलात्मक संगम संगीत प्रेमियों के लिए कई मधुर गीत लेकर आया।
नया दौर के लिए उडे़ जब जब जुल्फे तेरी गीत के लिए नैय्यर के दिलो दिमाग में पंजाब की लोकधुनें गूंज रही थीं। रफी और आशा से स्वर में यह गीत आया तो लोग मंत्रमुग्ध हो गए। रफी तो पंजाब से ही आए थे, ओपी नैय्यर ने आशाजी को पंजाब के लोकसंगीत और वहां के मिजाज के बारे में बताया। वहां लोकगायकी की शैली को समझाया। आशा पंजाब के रंग में रंग गई।
इस गीत की खूबसूरती यह भी थी कि दक्षिण भारतीय अभिनेत्री वैजयंती माला को इस गीत पर नृत्य करना था। आशा और वैजयंती माला ने कला को आत्मसात किया और फिर एक यादगार गीत बना। कहा जाता है कि नया दौर ही वह फिल्म थी जो पहले दिलीप कुमार और मधुबाला को साथ लेकर बनाई जा रही थी।
लेकिन मधुबाला के परिवार वालों ने उसे मुंबई से बाहर भेजने से इंकार किया। इस फिल्म का हर पक्ष लाजवाब है। दिलीप कुमार वैजंयती माला का अभिनय. ओपी नैय्यर का संगीत और रफी के साथ आशाजी की खनकती आवाज।
चैन से हमको जीने न दिया
इस गीत ने आशा भोसले को फिल्म फेयर अवार्ड दिलवाया था। लेकिन इस गीत के बाद ओपी नैय्यर के साज में फिर आशाजी को गाते हुए नहीं सुना गया। प्राण जाय पर वचन न जाए के बाद ओपी नैय्यर ने आगे भी संगीत दिया लेकिन आशा के बिना। जिस तरह फिल्म संगीत में मदन मोहन और लता के गीत संगीत का एक खास मुकाम है, वही पहचान ओपी नैय्यर और आशा की कला के साथ भी है।
मगर मदन मोहन के साथ लता के रिश्ते भाई बहन की तरह अटूट रहे। वहीं आशा और ओपी नैय्यर में कहीं दरार आई। कहा जाता है कि ओपी नैय्यर के आशाजी की बेटी को किसी बात पर डांटने से आशा इस तरह नाराज हो गईं कि फिर कभी उनके लिए नहीं गाया। आगे न किसी ने पूछा , न जाना ।
बस संगीत प्रेमी आज भी उन गीतों को सुनते हैं जिनका इन दोनों कलाकारों की साधना, मेहनत और रचनात्मकता से सृजन हुआ। यह जरूर है कि आशा को एक खास मुकाम तक पहुंचाने में अगर ओपी नैय्यर के संगीत का हाथ है, तो ओपी नैय्यर के संगीत को जिस खास आवाज ने सुनहरे पंख लगाए , उसका नाम आशा भोसले हैं।
इन आंखों की मस्ती के
उमराव जान जैसी फिल्में कभी कभी ही बनती है। उमराव जान के संगीत को तैयार करते वक्त खैय्याम के दिल मे पाकिजा का ख्याल था। आशा के गले की रेंज ऊंची थी। उनसे डेढ़ सुर नीचे गवाना चाहा। आशा ने खैय्याम से कहा, मैं तो नहीं इस पर नहीं गा पाऊंगी। खैय्याम ने उनसे कहा, आप कोशिश तो कीजिए।
नहीं ठीक लगेगा तो बदल देंगे। आशा ने कहा, आप यकीन रखिए मैं पूरे मन से गाऊंगी। सितार पर उस्ताद रहीस खान, संतूर पर शिवकुमार, और बांसुरी पर हरी प्रसाद चौरसिया जी थे। राग पहाड़ी पर आशाजी ने अलाप लेना शुरू किया। अजब सी खामोशी छा गई। जो गीत रिकार्ड हुआ वह अऩूठा था। गीत सज गया था।
ये मेरे वतन के लोगों
चीन युद्ध में देश की सीमाओं पर प्राण गंवाने वाले शहीदों की स्मृति में यह गीत लिखा गया था। बहुत कम समय में प्रदीपजी को यह गीत लिखना था, लेकिन उन्होंने इस गीत की आठ दस पंक्तियां नहीं, बल्कि सौ से ज्यादा पंक्तियां लिखी थीं। हालांकि गीत में केवल सोलह पंक्तियां ली गई। पहले यह गीत आशा भोसले से गवाया जा रहा था। लेकिन लता ने इस गीत को सुना तो अपनी इच्छा जताई।
आशा को किसी तरह का एतराज नहीं था। संगीतकार सी रामचंद्रन की धुन पर आखिर ए मेरे वतन के लोगों गीत लता ने ही गाया। हालांकि इस गीत की रिहर्सल आशा से करवाई गई थी। यह गीत इतिहास बना।
इसे फिल्म में लेने के लिए कई निर्माता निर्देशकों ने प्रदीपजी को मनाने की कोशिश की। लेकिन प्रदीपजी ने इसे फिल्म को नहीं दिया। यह गीत अविस्मरणीय है। अच्छा पक्ष यह भी है कि इस गीत को न गा पाने का आशाजी ने कभी कोई मलाल नहीं दिखाया। कहीं कोई मायूसी नही दिखाई।
आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा
आशाजी अपने संगीत गीत पर बहुत मेहनत करती रहीं। इस गीत की रिहर्सल के लिए वह संगीतकार के घर जाया करती थीं। जब रिहर्सल करके वह लौटीं तो अपनी कार में बैठते ही थिरकती आवाज में आ जा आ जा आ जा गुनगुनाने लगीं। इतने में उनके कार के ड्राइवर ने कार रोक दी और सड़क के एक तरफ कर दी। देखते ही देखते उसने कार का पिछला दरवाजा खोला, थर्मस से पानी निकाला और आशाजी को दिया।
इतना करते हुए उसने आशाजी से धीरे से पूछा, क्या आपको अस्पताल ले चलूं। आशाजी की कुछ समझ में नहीं आया। अस्पताल क्यों जाना है, क्या किसी को देखने जाना था। उसने कहा नहीं मैडम अभी आज कांप रही थीं, कुछ बुदबुदा रही थीं । क्या आपकी तबियत खराब है। आशा को सब समझ में आ गया। कहा अस्पताल जाने की कोई जरूरत नहीं। बस घर छोड़ो। घर पर घंटा दो घंटा फिर बीमार पडूंगी। फिर ठीक हो जाऊंगी।
अब के बरस भैजो भैय्या को बाबुल सावन में दीजो बुलाय
आशा भोसले से जब भी पूछा जाता है कि आपके बेहद पसंदीदा गीत कौन कौन से हैं, तो वह इस गीत का जरूर जिक्र करती हैं। रेडियो के एक प्रोग्राम में आशाजी ने बताया था कि इस गीत में उनका अपना निजी जीवन भी है। शादी करके जब वह अपने ससुराल गईं तो बहत समय तक अपने मायके नहीं जा सकी।
मायके से एक दूरी बनी हुई थी। ससुराल में भी उनके लिए अनमना सा माहौल बना हुआ था। आखिर वह दौर भी आया कि वह उस जीवन से बाहर निकलीं, लेकिन उस पल की यादें उनके मन में रहीं।
इस गीत में कहीं उन्होंने अपने आप को टटोला। आशाजी कहती हैं कि इस गीत को गाते हुए उनके मन मे कुछ अजीब सा भाव था। पिछली यादें फिर सामने आई और इस गीत को गाते गाते उनकी आंखें छलक आईं थीं।