‘मैंने प्यार किया’ वह सीन आज भी कई लोगों को याद होगा। घर से विद्रोह करने वाले सलमान से उनके पिता कहते हैं, 'तुम क्या-क्या सीखोगे प्रेम? तुम्हें तो सीखना भी नहीं आता...' और बदले में प्रेम का वह जवाब, 'प्यार सब कुछ सिखा देता है डैड!' बस, हाल तालियों से गूंज उठता था।
इसीलिए सिनेमा के पर्दे पर नायक हमारे दिल के करीब हो जाते हैं क्योंकि वे अंधेरे कोने में बैठे एक साधारण इनसान के प्रतिनिधि बन जाते हैं। वह उनके संग किसी से प्यार करता है उनके आंसुओं में रोता है, उनके संग हंसता है। विडंबना यह है कि सिनेमा के पर्दे पर एक आम इनसान के संघर्ष और जज्बे को साकार करने वाले ये नायक असल जिंदगी में साधारण होने से नफरत करने लगते हैं।
शायद सलमान भी असल जिंदगी में साधारण नहीं होना चाहते थे। कम से कम उनके साथ जुड़ी हर घटना यही कहती है। वे पर्दे के बाहर भी ‘लार्जर दैन लाइफ’ होना चाहते हैं। चाहे-अनचाहे वे कानून से परे जाते रहे हैं। आधी रात को नशे में धुत होकर गाड़ी चलाने का मामला हो, या काले हिरण के शिकार की घटना, बिना लाइसेंस हथियार रखने का आरोप या लगातार उनके बनते-बिगड़ते रिश्ते। वे एक ऐसे इनसान के रूप में सामने आते हैं जो हर तरफ से बेपरवाह होकर सिर्फ अपने तरीके से जीना चाहता है।
आज्ञाकारी बेटा या दबंग
थोड़ा गौर करें तो हम पाएंगे कि पर्दे पर सलमान की दो ही छवियां पॉपुलर हुई हैं। एक घर की सुरक्षा में पला-बढ़ा एक आज्ञाकारी बेटा और दूसरा दबंग, बदतमीज मगर दिल का भला। हम पहले किरदार को ‘मैंने प्यार किया’ से लेकर सूरज बड़जात्या की हर फिल्म में देख सकते हैं और दूसरा किरदार ‘दबंग’ से शुरु होकर उनकी हालिया फिल्मों तक जाता है।
कॅरियर की शुरुआती फिल्मों में सलमान कन्फ्यूज से दिखे। उनके साथ एक के बाद एक जुड़ते विवादों ने उन्हें और नुकसान पहुंचाया। ‘वीरगति’ और ‘चंद्रमुखी’ जैसी फिल्मों तक पहुंचते-पहुंचते लगा कि उनका फिल्मी कॅरियर अब खत्म है। एक्शन फिल्मों ने उन्हें कुछ संभाला मगर ‘दबंग’ ने उन्हें नई जिंदगी दी। यह सलमान का एक नया अवतार था। सिनेमा के पर्दे पर भी और असल जिंदगी में भी। यही तरीका था कि वे अपने जुड़े विवादों की आंच को दबाए बिना खुद को लोकप्रिय बनाए रख सकते थे।
इस ‘दबंग’ की बहुत सी खूबियां थीं। इसे लोगों ने बेहद पसंद किया। यह उनके दबी हुई इच्छाओं को अभिव्यक्त करता था। मुंहफट, तेज, बदतमीज मगर दिल का भला। धीरे-धीरे सलमान ने फिल्म की इस इमेज को अपनी ‘लार्जर दैन लाइफ’ का हिस्सा बना लिया। वे टीवी शोज़ में भी इसी तरह से दिखते थे। बाहर से नॉन सीरियस मगर भीतर से बेहतर इनसान।
‘बीइंग ह्यूमन’ जैसी संस्था से उनका जुड़ाव, परिवार के प्रति प्रेम, अनजानों की मदद करना, दोस्तों का साथ देना- इस ‘लार्जर दैन लाइफ’ स्टोरी का हिस्सा थे। मगर उनके पिता सलीम खान की लिखी फिल्में ही सिखाती हैं कि कितना भी बड़ा नायक हो वह कभी सिस्टम से बड़ा नहीं होता। सलमान का अतीत अब उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। शेक्सपीयर की ट्रैजेडी वाले नायकों की तरह वे पुराने अपराधों की प्रेत छायाओं से घिरते चले जा रहे हैं।
सलमान ने जिंदगी में कई बार प्रेम किया, नफ़रत भी की। नफ़रत पाई और बेइंतहा प्यार भी पाया। मगर शायद वे यह नहीं सीख सके कि यह रातों-रात शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला समाज वक्त बदलने पर यह सब कुछ उतनी ही आसानी से छीन भी सकता है, जितनी आसानी से दिया था।