न्याय का महत्व इस बात में भी है कि वह समय से मिले। लेकिन कितने मामलों में ऐसा हो पाता है? फिल्मों में दिखाई जाने वाली अदालतें अक्सर ड्रामाई होती हैं।
उनका कामकाज और किरदार हकीकत से दूर, काव्यात्मक न्याय की तरह होते हैं। परंतु चैतन्य तम्हाणे की फिल्म कोर्ट आपको हमारी अदालतों और उनके स्तंभ अधिवक्ताओं-न्यायाधीशों की कार्यप्रद्धति तथा उनके जीवन के विविध पक्षों को दिखाती है।
फिल्म के दृश्यों में कैमरा घूमता नहीं है। एक जगह स्थिर रहता। संभवतः यह निर्देशक का वक्तव्य है कि वह तटस्थ भाव से सब देख और दिखा रहा है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ जगहों पर यहां व्यंग्य भी है।
फिल्म एक मराठी जनकवि, लोकगायक और दलित कार्यकर्ता नारायण कांबले (वीरा साथीदार) पर चल रहे मुकदमे को दिखाती है। कांबले पर आरोप है कि उसका जनवादी गीत सुन कर मुंबई नगरनिगम के एक सफाई कर्मचारी वासुदेव पवार ने आत्महत्या कर ली।
पवार बगैर सुरक्षा उपायों के अंडरग्राउंड गटर की सफाई के लिए उतरा था और वहां मृत पाया गया। पुलिस के अनुसार, पवार मरने से दो दिन पहले कांबले की सभा में गया था जहां इस लोकगायक ने गीत गाया था कि सारे सफाई कर्मचारियों को गटर में उतर कर आत्महत्या कर लेनी चाहिए।
कांबली का मुकदमा जहां युवा विनय वोहरा (विवेक गोंबेर) लड़ रहा है, वहीं सरकारी वकील नूतन (गीतांजली कुलकर्णी) आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना चाहती है।
तम्हाणे ने इस पृष्ठभूमि में अदालत की रोजमर्रा की कार्यवाही दिखाई है। कैसे काम होता है। कैसे न्याय व्यवस्था सौ, सवा सौ साल पुराने कानूनों के हवाले से फैसलों की तरफ बढ़ती है।
कैसे तथ्यों तथा लोगों की लापरवाहियों के बीच तारीख पर तारीख पड़ती हैं। कैसे पीड़ित परेशान होते हैं, मगर न्याय दिलाने की प्रक्रिया में लगे लोगों का जीवन सामान्य ढंग से चल रहा होता है।
फिल्म में विनय वोहरा, नूतन और न्यायाधीश सदावर्ते अदालत के बाहर आम इंसान होते हैं। उनके मध्यमवर्गीय जीवन में विवाह, महंगाई, बीमारी, पारिवारिक चिंताएं और मांगलिक अवसर होते हैं। वे ज्योतिष और अंकशास्त्र में भी समस्याओं के हल ढूंढते हैं।
कुल मिला कर कोर्ट न्यायपालिका के सच को आईना दिखाती नजर आती है। इसे देख कर आप गहरी निराशा से भी भर सकते हैं। फिल्म को कुछ अंतराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं और पिछले दिनों सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा भी हुई है।
कोर्ट में हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और गुजराती भाषाओं के संवाद हैं। सभी कलाकारों का अभिनय यहां सधा हुआ है और सभी दृश्य जीवन की छाया जैसे लगते हैं। वे बनावटी नजर नहीं आते।
हां, इसे देखते हुए आपको धैर्य रखने की जरूरत पड़ती है क्योंकि अदालत की कार्यवाही जैसे बेहद धीमी गति से चलती है, वैसे ही कुछ जगहों पर फिल्म कछुआ चाल का एहसास कराती है।
अगर आप कला फिल्मों के शौकीन हैं, देश-समाज की चिंताएं आपको सताती हैं, सच को जानने की जिज्ञासा आपके भीतर है तो इस कोर्ट में आज ही जा सकते हैं। अगली तारीख पर बात न टालें।