फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'राजनीति' और 'वासेपुर' ने बदला मेरा कॅरियरः मनोज बाजपेई

Thu, 28 Feb 2013 05:23 PM IST
रोहित मिश्र
विज्ञापन
विज्ञापन
मनोज बाजपेई अपने किरदार को घोलकर पी जाने वाले कलाकार हैं। फिल्म कैसी भी हो दर्शकों को मनोज बाजपेई का किरदार जरूर याद रहता है। मनोज के लिए यह जरूरी नहीं है कि उनका रोल निगेटिव है या पॉजटिव। वह सिर्फ यह देखते हैं कि जो किरदार वह फिल्म में कर रहे हैं वह फिल्म को कितना प्रभावित कर रहा है। बीच के कुछ सालों में मनोज बाजपेई की कई फिल्में फ्लॉप हुईं।
विज्ञापन


यह मनोज की अदाकारी ही थी कि उन्होंने जबर्दस्त वापसी की। 'राजनीति', 'आरक्षण', 'चक्रव्यूह' के साथ वह 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के अलग-अलग किरदारों से दर्शकों को चकित करते रहे हैं। 'स्पेशल 26' में सीबीआई अधिकारी की भूमिका निभाने वाले मनोज बाजपेई इस साल तीन अलग-अलग तरह की फिल्मों में दिखेंगे। अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में मनोज ने अपने कॅरियर के अप एंड डांउस के अलावा फिल्म इंडस्ट्री के बदलते हुए ट्रेंड्स पर चर्चा की। पेश है मनोज बाजपेई के साथ हुई बातचीत के मुख्य अंशः,

'सत्या' और 'शूल' जैसी जबर्दस्त फिल्मों से शुरुआत करने के बाद ऐसा क्या हुआ कि आपके कॅरियर की गाड़ी अचानक ही लूप लाइन में चली गयी?
किसी भी कलाकार को फिल्म इस बात के लिए ऑफर होती है कि उसकी पिछली फिल्मी कितनी सफल रही। यदि आपने किसी फिल्म में अच्छा काम किया है और वह फिल्म फ्लाप रही है तो आप तारीफ तो पाएंगे पर आपको बड़ी फिल्म ऑफर नहीं होगी। मेरे साथ यही हुआ। मेरी फिल्मों में मेरे काम को तो पसंद किया गया पर संयोग से वह फिल्में ज्यादा नहीं चलीं। जब फिल्म नहीं चलती है तो उसके हीरो का परसेप्शन इंडस्ट्री में बुरा बनता जाता है। फिल्म न चलने का नुकसान निर्माता को तुरंत होता है पर निर्देशक और फिल्म के कलाकारों पर यह असर बाद में दिखना शुरू होता है।
विज्ञापन


इस बीच आप कुछ तमिल फिल्मों में भी दिखे?
मैं रूटीन किस्म की फिल्मों नहीं कर सकता। दूसरे बहुत सारे अभिनेता वैसी भूमिकाएं करने के लिए हैं। मैं सीमाएं और क्षमताएं दोनों ही जानता हूं। इस बीच जब मुझे मेरे मतलब की फिल्में ऑफर नहीं हो रही थीं तो मैने साऊथ की फिल्मों का रुख किया। फिर इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए आपको कुछ न कुछ हमेशा करते रहना होता है।

आप 'लंका' नाम की एक फिल्म में दिखे। आपके प्रशंसकों के मन में यह प्रश्न हमेशा रहेगा कि मनोज बाजपेई ने आखिर वह फिल्म की क्यों?
'लंका' फिल्म जब बननी शुरू हुई तो वह खराब फिल्म नहीं थी। फिल्म की स्क्रिप्ट को देखकर मैने वह फिल्म साइन की थी। फिल्म बनने के बाद फिल्म के निर्माता को लगा कि फिल्म में फिल्म को बेचने वाला मसाला तो है ही नहीं। निर्माता की  दखल के बाद फिल्म के काफी सारे हिस्से दोबारा शूट हुए। स्क्रिप्ट बदली गयी, कई सारे पुराने सीन हटाकर नए सीन डाले गए। मैं इससे सहमत नहीं था। चूंकि मैं कॉन्ट्रैक्ट से बंधा हुआ था इसलिए फिल्म से अलग नहीं हुआ। यह फिल्म इसलिए नहीं चली क्योंकि उसमें उसके निर्माता इनवॉल्व हो गए। यह फिल्म न तो मसाला फिल्म बन पायी और न ही कुछ और।

किसी फिल्म में निर्माता की दखल फिल्म को किस तरह से प्रभावित करती है?
फिल्म इंडस्ट्री में दो तरह के निर्माता हैं। एक वह जो निर्देशक से निर्माता बने हैं और जिनके पास सक्षम निर्देशकों की अपनी टीम होती है। दूसरी तरह के निर्माता सिर्फ पैसे डबल करने के लिए फिल्म प्रोड्यूस करते हैं। इन्हें खुद फिल्मों की समझ नहीं होती है। वह सिर्फ यह देखते हैं कि इस फिल्म में उनका पैसा डबल हो रहा है या नहीं। इन्हें कलात्मक नहीं बल्कि व्यवसाय की समझ होती है। फिल्म इंडस्ट्री के लिए ऐसे निर्माता खतरनाक हैं। अच्छी बात यह है कि इन दिनों जो बड़े निर्माता हैं वह सभी क्रिएटिव हैं और फिल्म निर्माण से उनका तालुक रहा है।

थोड़े बिगड़ चुके कॅरियर में बदलाव कहां से आया?
2007 से लेकर 2009 तक मैने 'स्वामी', '1971' और 'जेल' जैसी अच्छी फिल्में कीं। यह फिल्में नहीं चलीं। मेरा कॅरियर का ग्राफ 2010 में रिलीज हुई फिल्म 'राजनीति' से बदला। प्रकाश झा की इस फिल्म ने मुझे नया जीवन दिया। प्रकाश की फिल्मों की खूबसूरती यह होती है कि वहां किरदार छोटा हो या बड़ा नोटिस जरूर किया जाता है। 'राजनीति' फिल्म सफल हुई और मुझे बड़ी भूमिकाएं मिलनी शुरू हुईं। इसी के बाद 'आरक्षण' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्में आयीं। वासेपुर तो मेरे लिए बहुत बड़ी फिल्म थी। एक लंबे समय के बाद मैं किसी फिल्म का हीरो था। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जितनी चली और चर्चित हुई उसका मुझे बहुत फायदा हुआ। आगे फिर मैने प्रकाश झा के साथ 'चक्रव्यूह' फिल्म की। अब मैं फिर से वैसी ही फिल्में कर रहा हूं जैसी फिल्में मैं करना चाहता था।

किस निर्देशक के साथ काम करते वक्त ऐसा लगता है कि वह आपसे, आपका बेहतर निकलवा लेगा?
मुझे प्रकाश झा और अनुराग कश्यप के साथ काम करना सबसे अच्छा लगा। यह दोनों ही फिल्मकार, फिल्म का हर किरदार मेहनत के साथ गढ़ते हैं। इनकी फिल्मों में कोई हीरो या वीलेन नहीं होता। रोल यदि छोटा भी होता है तो भी वह प्रभाव छोड़ता है। इन फिल्मकारों के साथ काम करने में मजा आया। आगे भी इनके साथ काम करते हुए दिखूंगा। इसके अलावा नीरज पांडेय की फिल्म मेकिंग स्टाईल मुझे रास आयी।

सुनते हैं कि आपने 'स्पेशल 26' के लिए नीरज पांडेय से खुद के लिए काम मांगा था?
हां, यह सच है। नीरज पांडेय की 'ए वेडनसडे' देखने के बाद से ही मैं उनके साथ काम करना चाहता था। जब उन्होंने 'स्पेशल 26' बनायी तो उन्होंने मुझे एक प्रमुख भूमिका दी। यह फिल्म भी मेरे लिए एक बड़ी फिल्म हैं। मैं आगे भी नीरज पांडेय के साथ काम करना चाहता हूं।

'पिंचर', '1971' और 'स्वामी' जैसी फिल्में 'दबंग' या 'राऊठी राठौर' जैसी फिल्मों से फिल्म मेकिंग के मामले में बेहतर मानी जाती हैं। बावजूद इसके यह फिल्में नहीं चलती हैं इसकी क्या वजह मानते हैं आप?
फिल्म अच्छी है या बुरी वह इस बात से भी पहचानी जाती है कि वह फिल्म कितने समय तक याद रखी जाती है। आपने जिन बड़ी हिट फिल्मों का जिक्र किया वह फिल्में दर्शकों का मनोरंजन करती हैं इसलिए यह फिल्में चलीं। '1971' या 'स्वामी' जैसी फिल्में बड़े दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर बनायी भी नहीं गयी थीं। हां, यह सच है कि उन फिल्मों को उम्मीद से कम दर्शक मिले।

मल्टीप्लेक्स कल्चर आने के बाद क्या बदलाव देखते हैं?
कई ऐसी फिल्में जो इन दिनों बन रहीं हैं यदि मल्टीप्लेक्स न होते तो शायद यह फिल्में न बनतीं। मल्टीप्लेक्स कल्चर ने फिल्मकारों को इस बात का साहस तो दिया ही कि उसकी फिल्म रिलीज जरूर होगी। पहले ऐसा नहीं था। सिंगल स्क्रीन सिनेमा के दौर में वैसी ही फिल्में बनती थीं जिन्हें देखने वाला बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है। इधर अच्छी बात यह है कि हर तरह की फिल्में आ रही हैं और सभी चल रही हैं। 'काई पो चे' भी चलती है और 'मर्डर 3' भी।

आने वाले समय में कैसी फिल्मों में दिखेंगे?
इस साल मेरी 'राजनीति 2', 'सत्याग्रह' और 'शूट आउट एट वडाला' रिलीज होंगी। 'सत्याग्रह' और 'राजनीति 2' में मैं प्रकाश झा के साथ काम कर रहा हूं। इसके अलावा मेरे पास और कोई फिल्म नहीं है। मैं पहले से तय करके नहीं बैठता कि मुझे कैसी फिल्में करनी हैं। जब फिल्म ऑफर होती है तो उसकी स्क्रिप्ट देखकर ही यह तय करता हूं कि मुझे यह फिल्म करनी है या नहीं।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें