मोहम्मद रफी एक ऐसे हरफनमौला गायक हैं जिन्होंने अपने दौर के हर कलाकार को आवाज दी, हर संगीतकार के साथ काम किया और अपने समय हिट रहे हर गीतकारों के गीत गाए। 55 बरस की छोटी आयु पाने वाले रफी साहब का करियर विविधता के हिसाब से बहुत बड़ा था। 1944 से शुरू हुआ उनका यह फिल्मी सफर उनकी सांस थमने वाले साल 1980 तक जारी रहा।
रफी साहब की करियर की शुरुआत 1944 में रिलीज हुई फिल्म 'पहले आप' से हुई। संगीतकार नौशाद के निर्देशन में उन्होंने अपने पहला गीत गाया। 50 के दौर में रफी का कॅरियर उतनी गति नहीं पकड़ पाया। रफी को उनके कद के अनुरूप पहचान 1960 के बाद रिलीज हुई फिल्मों से मिली। 'चौदहवीं का चांद', 'ससुराल', 'घराना', 'प्रोफेसर', 'दोस्ती', 'काजल', 'सूरज', 'ब्रहमचारी', 'नीलकमल', जैसी फिल्में रफी की वजह से मकबूल हुईं और रफी इन फिल्मों के गीतों की वजह से। मोहम्मद रफी ने अपने करियर में शंकर जशकिशन, नौशाद, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आरडी वर्मन जैसे संगीतकारों के साथ सबसे ज्यादा जुगलबंदी की। 24 दिसंबर 1924 को जन्में रफी साहब 55 साल की आयु में ही सन 1980 में हम सबसे विदा हो गए।
यह हैं रफी साहब के सदाबहार नगमें
'ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं'
फिल्म हीर-राँझा/1970
'बाबूल की दुआएँ लेती जा'
जा तुझको सुखी संसार मिले
फिल्म नीलकमल/1968
'आई हैं बहारें मिटे जुल्मो-सितम'
प्यार का जमाना आया दूर हुए गम
फिल्म राम और श्याम/1967
'बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है'
- फिल्म सूरज/1966
'कोई सागर दिल को बहलाता नहीं
बेखुदी में भी करार आता नहीं'
-फिल्म दिल दिया दर्द लिया/1966
'पुकारता चला हूँ मैं गली-गली बहार की'
बस एक छाँव जुल्फ की, एक निगाह प्यार की
-फिल्म मेरे सनम/1965
'छू लेने दो नाजुक ओंठों को
कुछ और नहीं ये जाम है'
-फिल्म काजल/1965
'तेरे-मेरे सपने अब इक रंग हैं
जहाँ भी ले जाएँ राहें हम संग हैं'
-फिल्म गाइड/1965
'ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना'
-पिल्म संगम/1964
'तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को
किसी की नजर न लगे'
फिल्म ससुराल/1961
'नैन लड़ जई हैं, तो मनवामा कसक होइबे करी'
-फिल्म गंगा-जमुना/1961
'चाहे मुझे कोई जंगली कहे'
फिल्म कहने दो जी कहता रहे
-फिल्म जंगली/1961
'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया'
-फिल्म हम दोनों/1961