नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ अमिताभ बच्चन भी काम करना चाहते हैं। किक के बाद नवाज अब बजरंगी भाईजान में सलमान खान के साथ ईद पर आ रहे हैं। शाहरुख के संग रईस में उनके तेवरों का सबको इंतजार है। मांझीः द माउंटेन मैन में वह अगले महीने बॉक्स ऑफिस की चुनौती स्वीकार करेंगे। इस शानदार अभिनेता पर आज सबकी नजर है। यूपी के धरतीपुत्र नवाजुद्दीन सिद्दिकी से बातचीत की रवि बुले ने...
-सलमान खान की प्रशंसा तो आप बहुत करते हैं लेकिन उनकी वे क्या खूबियां हैं, जो अपने जीवन में उतारना चाहेंगे?
- उनकी सबसे खास बात यह है कि वह आगे बढ़ कर सबकी मदद करते हैं। मैं चाहता हूं कि यह बात मेरे अंदर भी आए। उनकी और भी खूबियां हैं। वह अपने तनाव को सामने नहीं आने देते। काम करते हुए खुश रहेंगे, आपको भी हंसाते रहेंगे। बजरंगी भाईजान की शूटिंग के दौरान वह कठिन दौर से गुजर रहे थे, लेकिन काम पर कोई फर्क पड़ने दिया।
सलमान का इतना प्रभाव है कि...
-कश्मीर कैसा लगा?
- यह बहुत ही अच्छा अनुभव था। सीधे-सादे लोग हैं। हम कश्मीर को ऐसे लेते हैं कि पता नहीं वहां क्या हो रहा है। बहुत ही कूल स्टेट है कश्मीर। शूटिंग के दौरान कोई परेशानी नहीं आई।
-बजरंगी भाईजान में आप पाकिस्तानी पत्रकार बने हैं। इस नाते क्या रोल में कोई खास बात है?
- खास बात यह है कि यह आम पत्रकार है। दूसरों की तरह इसे भी हमेशा ब्रेकिंग न्यूज की तलाश रहती है। ब्रेकिंग न्यूज नहीं है, तो बना दे! मजेदार किरदार है। सलमान की यात्रा में यह उनके साथ रहता है।
-अब तक की फिल्मों में आपकी ऐक्टिंग की रेंज दूसरे ऐक्टरों या सितारों से बिल्कुल अलग दिखी है। किक में आपकी मौजूदगी विशेष रूप से बार-बार दर्ज होती रही। कई बार लगता है कि आप सामने वाले ऐक्टर को खा जाएंगे!
- देखिए, ये खा जाने वाली बात तो गलत है। ऐसा नहीं होता। मुझे हमेशा साथ में काम करने के लिए अच्छे कलाकार मिले हैं। मैं आपको किक और बजरंगी की बात बताता हूं। कई बार सलमान साब ने पंच लाइनें मुझे बोलने के लिए दीं! सलमान का इतना प्रभाव है, इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग है कि मेरे कुछ भी कर लेने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ...और अगर मैं इस इरादे के साथ काम करने जाऊं कि मैं सामने वाले को खाने जा रहा हूं तो इसका मतलब है कि मैं उनके द्वारा निभाए जा रहे किरदार का अपमान कर रहा हूं। सीन करते हुए मुझे सिर्फ यह लगना चाहिए कि सामने ऐक्टर है, कैरेक्टर है। अगर मैं ऐक्टिंग करते हुए सामने सलमान, शाहरुख या आमिर खान को देख रहा हूं तो इसका मतलब है कि मैं उनके कैरेक्टर को समझ नहीं रहा। मेरी नासमझी उनका अपमान है। वे भी एक कैरेक्टर कर रहे हैं। जितनी ईमानदारी से आप अपना रोल करके चले जाएं, उतना अच्छा है।
क्या कभी डायरेक्टर ने आपसे कहा कि ऐक्टिंग की टोन थोड़ी डाउन करें
-क्या कभी डायरेक्टर ने आपसे कहा कि ऐक्टिंग की टोन थोड़ी डाउन करें क्योंकि वह सितारे से बेहतर लग रही है?
- कभी ऐसी बात नहीं हुई। फिल्म हमेशा सबसे बड़ी होती है। ऐक्टरों से भी बड़ी। फिल्म के अच्छे के लिए डायरेक्टर जो चाहेंगे ऐक्टर को वही करना होगा। लेकिन मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ कि डायरेक्टर ने कहा कि थोड़ा टोन डाउन करो। हर कलाकार की अपनी खूबी होती है और सबकी अलग-अलग खूबियों को मिला कर फिल्म बनती है।
-रोल को निभाने में डायरेक्टर की कितनी मदद लेते हैं?
- कई बार मुझे लगता है कि एक व्यक्ति के रूप में मैं थोड़ा-सा कनफ्यूज हूं। ऐसे में जितना फीड-बैक डायरेक्टर मुझे देता है, वह मैं पूरा लेता हूं।
-खबर है कि अमिताभ बच्चन भी आपके साथ काम करना चाहते हैं!
- यह मेरी खुशकिस्मती है। मैं भी उनके साथ काम करने की बहुत ख्वाहिश रखता हूं और बहुत जल्दी ही उनके साथ काम करूंगा।
-यह भी खबर है कि आपने यशराज जैसे बैनर की फिल्म में खांटी विलेन का रोल निभाने से इंकार कर दिया?
- इसके बारे में तो मैं कुछ भी नहीं जानता कि यह बात कैसे कहां से आई।
-कामयाबी के बाद आपकी कई पुरानी फिल्में सामने लाने की कोशिशें हैं। पिछले दिनों लतीफ नाम की फिल्म आई। मगर आपने उसे बिल्कुल प्रमोट नहीं किया। क्या आप अब पुरानी फिल्मों से खुश नहीं हैं?
- लतीफ नाम की कोई पिक्चर मैंने कभी नहीं की। बारह साल पहले मैंने कोई शॉर्ट फिल्म की थी, पंद्रह मिनट की। उन्होंने बाद में उसे ही बढ़ा-बढ़ा कर पूरी फिल्म बना डाली शायद। मुझे पता भी नहीं। जब यह फिल्म आई तब मैं कश्मीर में शूटिंग कर रहा था। मुंबई आया तो पोस्टर देखे।
क्या आप चाहते हैं कि सफलता के दिनों से पहले की फिल्में रिलीज हों?
-क्या आप चाहते हैं कि सफलता के दिनों से पहले की फिल्में रिलीज हों?
- बिल्कुल। मैं तो जरूर चाहता हूं कि लोग उन्हें देखें। वे रिलीज हों... और वे धीरे-धीरे आ भी रही हैं। मेरी फिल्में थियेटरों में आने में थोड़ी लेट इसलिए हो जाती हैं कि वे विश्व सिनेमा के फेस्टिवलों में घूमती हैं। डायस डायस, अनवर का अजब किस्सा, देख इंडियन सर्कस ऐसी ही फिल्में हैं। ये दो साल बाद भी रिलीज होंगी तो पुरानी नहीं लगेंगी क्योंकि इनके विषय ही ऐसे हैं।
-क्या आप आर्ट हाउस सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा का फर्क मानते हैं?
- मुझे जिन फिल्मों से लोगों ने जाना वे पूरी तरह से कमर्शियल थीं। मुझे इन्हीं फिल्मों से पहचान मिली। गैंग्स ऑफ वासेपुर में सबसे पहले लोगों ने पहचाना। इसमें नाच-गाना-ऐक्शन-लव स्टोरी-थ्रिलर सब कुछ था। तलाश कमर्शियल थी। किक ने काफी लोकप्रियता दी। मैं हमेशा सोचता हूं कि आर्ट हाउस या कमर्शियल के फर्क में जाने के बजाय रोचक फिल्में करो। अगर आप आर्ट हाउस फिल्म करें और उसे फेस्टिवलों में तारीफ न मिले, वे यहां भी रिलीज न हों तो ऐसी फिल्म करके क्या फायदा?