उदय चोपड़ा महत्वाकांक्षी हैं। बॉलीवुड फिल्मों में उनकी ऐक्टिंग की पारी भले ही कामयाब नहीं है, मगर उन्होंने सपने देखना नहीं छोड़ा। वह हॉलीवुड में फिल्म निर्माता बन गए हैं। उन्हें सफलता की तलाश है। वैसे ‘धूम’ सीरिज की फिल्मों में जब तक उनका रोल रहेगा, वे दिखते रहेंगे।
‘धूम-3’ में जय (अभिषेक बच्चन) और अली (उदय चोपड़ा) क्या नया कर रहे हैं?
ईमानदारी से कहूं तो कुछ भी नया नहीं कर रहे। दोनों हमेशा की तरह विलेन के पीछे हैं। अली का रोल पहले
जैसा हंसमुख और मजाकिया है। असल में ‘धूम’ सीरीज की फिल्में खलनायकों की कहानी है।
अतः हर बार वे बदल जाते हैं। तय है कि ‘धूम-3’ में भी लोग आमिर खान को ही देखने आएंगे। जबकि अभिषेक और मैं अपना काम
कर ही रहे हैं। हां, दोनों के संबंध अब पहले की तरह सख्त पुलिस अफसर और उसके सहायक के नहीं हैं।
‘धूम’ में आपके साथ एशा देओल थीं। ‘धूम-2’ में बिपाशा बसु। इस बार आप किसके साथ रोमांस कर रहे हैं?
ऑस्ट्रेलियन अभिनेत्री हैं, टैबरेट बेथल। वे हॉलीवुड में भी काम कर रही हैं। फिल्म में वह शिकागो की पुलिस ऑफिसर का रोल निभा रही हैं, जो अली को पसंद आने लगती है। अली उन्हें लेकर क्या क्या कल्पनाएं करता है, यह आप फिल्म में देखेंगे।
आपका ऐक्टिंग कैरियर धीमी रफ्तार से चल रहा था, मगर आप फिल्मों में दिखते थे। क्या हुआ कि ‘प्यार इम्पॉसिबल’ (2010) के बाद आप गायब हो गए?
‘प्यार इम्पॉसिबल’ के बाद मैंने तय किया कि अब ऐक्टिंग कैरियर को पीछे रखूंगा। मेरे मन में प्रोड्यूसर बनने की इच्छा थी। परंतु यहां आदि (बड़े भाई आदित्य चोपड़ा) बहुत अच्छा कर रहे हैं।
तब मैंने लास एंजिलिस (अमेरिका) में अपनी एक कंपनी खोली। जिसका नाम है वाईआरएफ एंटरटेनमेंट। हम वहां दो फिल्में बना चुके हैं। पहली फिल्म अगले साल मार्च में रिलीज करेंगे।
वाईआरएफ एंटरटेनमेंट, उसकी फिल्मों और अपनी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताइए...।
हमारी कंपनी का उद्देश्य हॉलीवुड की तर्ज पर पूरी तरह पश्चिम देशों के लिए फिल्में बनाना है। मेरी भूमिका वहां बिल्कुल अलग है। छह से आठ महीने मैं वहीं रहता हूं।
आगे जाकर यह वक्त शायद और बढ़ जाए। जहां तक फिल्मों की बात है तो हमारी पहली फिल्म ‘ग्रेस ऑफ मोनाको’ है, जिसमें निकोल किडमैन हैं।
फिल्म पुराने जमाने की हॉलीवुड अभिनेत्री ग्रेस कैली की कहानी है, जिन्होंने मोनाको के राजकुमार से विवाह किया था। दूसरी फिल्म है‘लांगेस्ट वीक’। यह एक रोमांटिक फिल्म है। जिसमें ओलिविया वाइल्ड और जेसन बेटमैन हैं।
क्या आप वहां बॉलीवुड के लिए भी फिल्में बनाएंगे?
जब मुझे वहां कामयाबी मिलेगी तो यहां के लिए क्यों बनाऊंगा...? मेरे सोचने का ढंग ज्यादातर वेस्टर्न है। मैं वहीं के लोगों को लेकर फिल्में बनाऊंगा।
हां, अगर कोई ऐसी स्क्रिप्ट हुई जिसे इंडिया में शूट करने की जरूरत हुई या इंडियन ऐक्टर की जरूरत हुई तो जरूर वैसा करूंगा। हकीकत यह है कि जो काम यहां आदि कर रहा है, मैं उससे बेहतर नहीं कर सकता।
प्रोड्यूसर या डायरेक्टर आप यहां भी बन सकते थे। अमेरिका क्यों चले गए?
वह दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म मार्केट है। वैसे मेरे पिता (यश चोपड़ा) ने भी कहा था कि यहीं काम करो। हमारे पास इंडिया की सबसे बड़ी फिल्म कंपनी है।
कोई भी ऐक्टर तुम्हारी फिल्म में काम कर लेगा। परंतु यहां मैं कुछ अलग नहीं कर पाता। दूसरा कारण यह कि आदि ने कंपनी को अच्छे ढंग से संभाला है।
मैं रहता भी तो बरगद के तले रहने जैसा होता। मेरा स्वतंत्र विकास नहीं हो पाता। मैं भी महत्वाकांक्षी हूं। यही सोचकर मैंने जाना तय किया।
बड़े भाई और फ्रेंड फिलॉसफर गाइड के रूप में आदि की आपकी जिंदगी क्या भूमिका है? खास तौर पर आपके पिता के गुजर जाने के बाद...।
जब पिताजी थे तब मैं और वो जोक करते थे कि भाई तो हम दोनों हैं, आदि हमारा बाप है! वह बहुत गंभीर और परफेक्शनिस्ट है।
आदि और मुझमें केवल डेढ़ साल का फर्क है, मगर उसकी पर्सनेलिटी ऐसी है कि आपको देख कर लगेगा, वह मुझसे दस साल बड़ा है।
सच कहूं तो मैं उसे पिता की तरह ही मानता हूं। पिताजी थे, तब भले ही हमारे बीच कभी किसी बात पर झगड़ा हो जाता था, मगर अब तो मुझे जो बात आदि कह देता है वह मैं मन से मान लेता हूं।
पिताजी के न रहने के बाद हमारा रिलेशन पॉजिटिव ढंग से बदल चुका है। वह जिंदगी के हर मसले पर मुझे रास्ता दिखाता है।