हंसी तो फंसी के हीरो का मानना है कि लड़कियां आसानी से इंप्रेस नहीं होतीं। जानिए उन्होंने कैसे कैसे यह काम किया।
दिल्ली से मुंबई आए सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ठान रखा था कि वह फिल्मों के अलावा कुछ नहीं करेंगे। इसलिए वह फिल्मों के प्रोडक्शन से जुड़े और फिर करन जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस की ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ उन्हें मिली। उन्हें पसंद किया गया। ‘हंसी तो फंसी’ सोलो हीरो के रूप में उनकी नई शुरुआत है।
हंसी तो फंसी को आप असली लाइफ में कितना सच मानते हैं?
उत्तर भारत में ये बहुत कॉमन जुमला है। यूपी, दिल्ली, पंजाब चले जाइए, दोस्तों के बीच इस तरह की बातें होती रहती हैं। लड़की हंसती है तो ऐसी नहीं कि वह प्यार ही करने लगी है लेकिन हां एक चांस होता है लड़के का! यह तो अच्छी बात है कि लड़का किसी लड़की को हंसाने में कामयाब रहे या फिर लड़की लड़के से हंस कर मिले। लेकिन मैं हमेशा कहता हूं कि अगर दोस्त आपके कान में कहता है कि ‘हंसी तो फंसी’ तो उसकी बात मत सुनो क्योंकि लड़की के हंसने के बाद भी आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है।
कैसी मेहनत करनी पड़ती है?
हर लड़की अलग तरह की होती है। सबका अपना नेचर होता है। किसी को कुछ पसंद है, किसी को कुछ। यह आपको समझना पड़ता है कि जिस लड़की को इंप्रेस करना चाहते हैं वह क्या पसंद करती है। मेरा विश्वास कीजिए कि कोई लड़की आसानी से इंप्रस नहीं होती। हर लड़की को इंप्रेस करना कठिन होता है।
परिणीति को हंसाना कितना मुश्किल था?
उसका तो पूछिए ही मत। वह इतना हंसती है कि शुरू होने के बाद बंद नहीं होती। उसे सुबह कोई चुटकुला सुना देते थे तो शाम तक हंसती रहती थी।
हंसी तो फंसी में आपका किरदार क्या है?
यह आज के जमाने का ऐसा लड़का है जिससे उसके घर के लोगों, उसके दोस्तों को बहुत उम्मीदें नहीं कि वह कुछ कर सकेगा। घरवालों ने उसे पैसे बनाने का एक टास्क दिया हुआ है। उसकी गर्लफ्रेंड भी उससे पूछती है कि वह जब कुछ है ही नहीं तो पैसे कैसे बनाएगा। यह लड़का सीधा-सादा है। इसकी जिंदगी आसान नहीं है। कुल मिला कर यह बहुत ही सहज किरदार है। जरा भी जटिल नहीं है। दर्शकों को यह अपने आस-पास का लड़का लगेगा। पिछली फिल्म में जहां लुक पर ध्यान था, वहीं इस फिल्म में मैंने परफॉरमेंस पर जोर दिया है।
फिल्म इंडस्ट्री से बाहर का होने के बावजूद ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में आपको पहचान मिली। क्या अब लगता है कि चीजें आसान हो गई हैं?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। जब बाहर थे तब भी कॉम्पीटिशन था और अब जब फिल्में मिलनी लगी हैं तब भी कॉम्पीटिशन है। अच्छा काम करने का प्रेशर है। कुछ कर लिया है, कुछ बन गए हैं यह सब बातें तो कई सालों के बाद मन में आ सकती है। अभी तो सही ढंग से शुरुआत भी नहीं हुई है।
क्या आपको लगता है कि ऐक्टर बनने खास तौर पर हीरो बनने के लिए गुड लुकिंग होना जरूरी है?
अगर यह बात सच है तो मैं कहूंगा कि इसका नुकसान भी है। लोग सोचते हैं कि यह गुड लुकिंग है इसलिए ऐक्टर अच्छा नहीं होगा। ‘हंसी तो फंसी’ में मेरी यह बताने की कोशिश है कि अगर कोई गुड लुकिंग है तो वह परफॉर्म भी अच्छा कर सकता है।
अगली फिल्म में आप विलेन के रूप में नजर आएंगे!
जी, उस फिल्म का नाम ‘विलेन’ है। यह पारंपरिक खलनायक नहीं है। फिल्म बताएगी कि हर आदमी में कुछ नेगेटिव होता है। फिल्म में एक बढ़िया लव स्टोरी है। ड्रामा और ऐक्शन जबर्दस्त है। फिल्म में आपको मेरे दो लुक नजर आएंगे।