फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अभिनय के साथ बदला फिल्मों का ट्रेंड

Mon, 15 Oct 2012 01:58 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
विज्ञापन
विज्ञापन
अशोक कुमार की फिल्मों पर बात करना हिंदी फिल्मों के इतिहास को खंगालने जैसा होता है। अशोक कुमार के ट्रेंड और अदाएं ही हिंदी सिनेमा की शैली बनती गईं। 1931 में भारत की पहली बोलती हुई फिल्म आलम आरा रिलीज हुई तो 1936 में अशोक कुमार के फिल्मी करियर का आगाज हो गया।
विज्ञापन


फिल्मी कॅरियर का आगाज़
फिल्मों से अशोक कुमार के जुड़ने की घटना भी कम दिलचस्प नहीं है।1936 में बांबे टाकीज स्टूडियो की फिल्म जीवन नैया का नायक अचानक बीमार हो गया। कंपनी को नए कलाकार की तलाश थी। स्टूडियो के मालिक हिमांशु राय की नजर उनके लैबोरेटरी असिस्टेंट अशोक कुमार पर लंबे समय से थी। उन्होंने अशोक के सामने अभिनय करने का प्रस्ताव रखा।

अशोक की दिलचस्पी फिल्म के तकनीकी पहलुओं पर ज्यादा थी। वह फिल्म मेकिंग में ही अपना करियर बनाने के लिए आए थे। इस प्रस्ताव पर अनमने ढंग से सहमति देने के साथ ही उनकी फिल्मी करियर की गाड़ी चल और फिर दौड़ पड़ी।
विज्ञापन


बदला ऐक्टिंग का ट्रेंड
अशोक कुमार जब फिल्मों में दाखिल हुए तो उस समय हिंदी फिल्मों का अपना कोई ट्रेंड नहीं था। पारसी थिएटर से जुड़े लोग ही फिल्मों की तरफ मुड़े थे इसलिए स्वाभाविक तौर पर फिल्मी की बनावट, शिल्प और ऐक्टिंग में पारसी थिएटर की लाउड शैली झलकती थी। अशोक कुमार ने इस ट्रेंड को बदला। उनकी संवाद अदायगी और अभिनय का अंदाज दोनों ही पारसी थिएटर से अलग थे। अभिनय का ट्रेंड बदलने के साथ अशोक कुमार फिल्मी विषयों के ट्रेंड सेटर के रूप में भी जाने जाते हैं। 

पहला 'ग्रे शेड कैरेक्टर'
फिल्म 'किस्मत' ने फिल्म इंडस्ट्री को एक नया ट्रेंड दिया। यह पहली बार हो रहा था कि कोई नायक पर्दे पर नकारात्मक किरदार में नजर आए। 1943 में किया गया यह प्रयोग दर्शकों को खूब रास आया। किस्मत भारत की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म बनकर उभरी।

1936 में 'जीवन नैय्या' करने के बाद अशोक कुमार ने देविका रानी के साथ ही 'अछूत कन्या', 'इज्जत', 'सावित्री' और 'निर्मला' जैसी फिल्में कीं। 1938 के बाद उनकी कुछ फिल्में जैसे 'कंगन', 'बंधन' और 'झूला' अभिनेत्री लीला चिटनिस के साथ प्रदर्शित हुईं।

एक के बाद एक बड़ी फिल्में
अशोक कुमार ने एक के बाद एक बड़ी फिल्में दीं। निर्देशक कमाल अमरोही के साथ की गई 'महल' एक भव्य और कलात्मक फिल्म थी। इस फिल्म में मधुबाला उनके साथ थीं। 1953 में मीना कुमारी के साथ आई फिल्म 'परिणिता' भी एक सफल फिल्म थी। इसके बाद रिलीज हुई फिल्में 'बहू बेगम', 'बंदिनी' और 'आशीर्वाद' भी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुईं।

1958 में अशोक कुमार ने एक नया प्रयोग किया। अशोक कुमार ने अपने दो भाईयों अनूप कुमार और किशोर कुमार के साथ मिलकर कॉमेडी फिल्म चलती का नाम गाड़ी बनाई। हिट होने के साथ यह फिल्म चर्चित भी रही।

अभिनय की दूसरी पारी
चरित्र अभिनेता के रूप में भी अशोक कुमार ने कई फिल्में की। ऋषीकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसे प्रयोगधर्मी निर्देशकों के साथ उन्होंने कई सफल फिल्मों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई।

1980 में रिलीज हुई ऋषीकेश मुखर्जी की फिल्म 'खूबसूरत' के अलावा 1981 में आई 'खट्टा-मीठा' और 1982 में आई 'शौकीन' सफल फिल्मों में रही। इन फिल्मों में उन्होंने अपने सहज अभिनय के दम पर काफी लोकप्रियता बटोरी।

पद्मभूषण और दादा साहेब फालके अवार्ड
अशोक कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिसमें वर्ष 1962 में फिल्म “राखी” के लिए पहली बार और फिर 1963 की फिल्म “आशीर्वाद” शामिल हैं।

साल 1966 में फिल्म “अफसाना” के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा गया। वे वर्ष 1988 में हिंदी सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। 1998 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।

अशोक कुमार का जीवन
बिहार के भागलपुर शहर के आदमपुर मोहल्ले में 13 अक्टूबर, 1911 को पैदा हुए अशोक कुमार उर्फ दादामुनि सभी भाई-बहनों में बड़े थे। उनके पिता कुंजलाल गांगुली मध्य प्रदेश के खंडवा में वकील थे। उनकी ज्यादातर पढ़ाई कोलकाता में हुई। गायक एवं अभिनेता किशोर कुमार एवं अभिनेता अनूप कुमार उनके छोटे भाई थे।

अशोक कुमार की इन्हें फिल्मों में लेकर आए। लगभग छह दशक भूमिकाओं से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले अशोक कुमार 10 दिसंबर, 2001 को इस दुनिया को अलविदा बोल गए।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें